सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस / आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, भोपाल परिसर में 21 दिनों तक चलने वाली राष्ट्रीय कार्यशाला के 20वें दिन केरल से पधारे कुडियाट्टम नृत्य शैली के अत्यन्त महत्वपूर्ण कलाकार मधुमार्गी एवं इन्दुमार्गी ने अपने सोदाहरण व्याख्यान के अन्तर्गत सौगन्धिकाहरणम् और पूतनामोक्षम् का अद्भुत अभिनय करते हुए कार्यशाला में उपस्थित प्रतिभागियों एवं दर्शकों को रोमांचित कर दिया।
कार्यक्रम में भोपाल परिसर के निदेशक रमाकान्त पाण्डेय और बड़ी संख्या में प्राध्यापक उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन सुश्री ममता और उदित ने किया और धन्यवाद ज्ञापन संगीता गुन्देचा ने किया।

कूडियाट्टम एक संस्कृत रूपकाभिनय (नाट्यशैली) है। एक नाटक का केवल एक अंक प्रस्तुत करने में 5 से 41 दिनों तक का समय लग सकता है। इसका कारण यह है कि प्रत्येक वाक्य और श्लोक को अधिकतम अभिनय की संभावनाओं का उपयोग करते हुए विस्तृत रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
“नीलकण्ठ कवि के ‘कल्याण सौगन्धिकम्’ नामक व्यायोग से भीम के एक श्लोक अभिनय इंदु मार्गी ने किया। इस दृश्य में जब भीम कल्याण सौगंधिक फूल की खोज में गंधमादन पर्वत के वन में पहुँचता है, वहाँ उसे एक दृश्य दिखाई देता है — एक हाथी भोजन करके सो रहा है। तभी एक विशाल अजगर गुफा से बाहर निकलकर रेंगता हुआ आता है और हाथी का पैर निगलने लगता है। हाथी जागकर दर्द में चिंघाड़ता है। उसकी आवाज़ सुनकर एक सिंह वहाँ आता है और हाथी के मस्तक पर प्रहार करके उसे फाड़ देता है और उसका रक्त पीता है। हाथी, सिंह और अजगर — इन दोनों के बीच फँसकर अत्यंत करुणा जनक स्थिति में अपने अंतिम श्वासें लेता है।”दूसरी प्रस्तुति श्रीकृष्ण चरितम् नंग्यारकूथ का एक दृश्य है, जिसे इंदु मार्गी ने प्रस्तुत किया। पूतना मायामंत्र जपकर अदृश्य हो जाती है और सुंदर स्त्री का रूप धारण करके नंदगोप के घर में प्रवेश करती है और पालने में सोते हुए कृष्ण की मोहिनी मुस्कान और बालरूप की शोभा देखकर उसकी बुद्धि भ्रमित हो जाती है।
वह उसे उठाने का प्रयास करती है, परंतु बालक का भार सहन नहीं कर पाती और मन ही मन प्रार्थना करती है कि वह स्वयं उठकर उसकी गोद में आ जाए। जब वह उसे स्तनपान कराने का विचार करती है, तभी उसे महसूस होता है कि इस बालक को मार पाना उसके वश में नहीं — वह उसके सौंदर्य और निष्कलंक भाव को देखकर निश्चय करती है कि इसे वह मार नहीं सकती। इसलिए वह उसे फिर से पालने में लिटा देती है। परंतु उसके मन में भय जागता है कि यदि कंस को यह मालूम हो गया कि उसने बालक को नहीं मारा, तो वह उसे तलवार से मार डालेगा। यह सोचकर वह दोबारा उसे उठाने का प्रयास करती है। इस क्षण में वह कृष्ण के प्रति वात्सल्य, कंस के प्रति क्रोध, अपनी दुविधा पर दुःख और गहरा भय प्रकट करती है। अंत में वह उसे स्तनपान कराती है, लेकिन कृष्ण उसके प्राण चूस लेते हैं। पूतना की नसें फट जाती हैं और वह विकराल रूप में मृत्यु को प्राप्त होती है।
#केंद्रीय_संस्कृत_विश्वविद्यालय #कुडियाट्टम #संस्कृत_नाट्यकला #भोपाल #पूतनामोक्षम् #सौगन्धिकाहरणम् #भारतीय_परंपरा