सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : 40 साल में 38% सिकुड़े कश्मीर के ग्लेशियर, श्रीनगर में जल संकट गहराया
श्रीनगर। कश्मीर घाटी में जलवायु परिवर्तन का असर अब जल संसाधनों और पेयजल आपूर्ति पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। पीर पंजाल पर्वतमाला के ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ रहे हैं, सर्दियों में बर्फबारी के स्वरूप में बदलाव आ रहा है और बर्फ पहले की तुलना में जल्दी पिघलने लगी है। इसका असर दूध गंगा नदी के जल प्रवाह पर पड़ रहा है, जो श्रीनगर के दो लाख से अधिक लोगों के लिए पेयजल का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। चार दशकों में ग्लेशियरों का क्षेत्रफल 38 प्रतिशत घटा वर्ष 2024 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, पीर पंजाल क्षेत्र के कश्मीर बेसिन में वर्ष 1980 में 122 ग्लेशियरों का कुल क्षेत्रफल लगभग 25.7 वर्ग किलोमीटर था। वर्ष 2020 तक यह घटकर करीब 15.9 वर्ग किलोमीटर रह गया। इस तरह चार दशकों में ग्लेशियरों के कुल क्षेत्रफल में लगभग 38 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। अध्ययन के निष्कर्ष हिमालयी क्षेत्र में बदलती जलवायु और बर्फ पर निर्भर जल संसाधनों के भविष्य को लेकर गंभीर चिंता पैदा करते हैं।
दूध गंगा पर बढ़ता दबाव दूध गंगा नदी का उद्गम पीर पंजाल पर्वतमाला में तत्ताकोटी चोटी के पास स्थित हिमनदों से होता है। नदी बडगाम और पुलवामा के क्षेत्रों से गुजरते हुए श्रीनगर पहुंचती है और आगे झेलम नदी में मिलती है। इसके ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में ग्लेशियर, बर्फ और झरने नदी के प्रवाह को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण सर्दियों में बर्फबारी कम होने और तापमान बढ़ने से बर्फ जल्दी पिघलने लगी है। पहले सर्दियों में जमा बर्फ वसंत और गर्मियों के दौरान धीरे-धीरे पिघलती थी, जिससे अप्रैल से जुलाई तक पानी की उपलब्धता बनी रहती थी। अब बर्फ का पहले पिघलना और लंबे समय तक शुष्क मौसम बने रहना गर्मियों में जल संकट को बढ़ा सकता है। दो लाख से अधिक लोगों की जलापूर्ति प्रभावित होने का खतरा दूध गंगा पर निर्भर श्रीनगर के ऊपरी इलाकों में पानी की कमी का असर लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ रहा है। स्थानीय निवासियों के अनुसार, गर्मियों में कई बार नलों से नियमित पानी नहीं आता। कुछ परिवारों को पानी जमा करने के लिए अतिरिक्त टंकियां लगानी पड़ी हैं, जबकि अन्य वैकल्पिक जल स्रोतों पर निर्भर हैं।
जल शक्ति विभाग की अधीक्षण अभियंता अनब्रीना अंजुम के अनुसार, दूध गंगा जल शोधन संयंत्र की क्षमता 45.5 मिलियन लीटर प्रतिदिन है। यह संयंत्र श्रीनगर के दो लाख से अधिक लोगों को पेयजल उपलब्ध कराता है। नदी में कच्चे पानी का प्रवाह घटने पर विभाग को वैकल्पिक पंपिंग व्यवस्था का सहारा लेना पड़ता है। कम बारिश और तेज बारिश, दोनों बन रहे चुनौती जल संकट की समस्या केवल कम पानी तक सीमित नहीं है। लंबे समय तक बारिश न होने से नदी का प्रवाह घटता है, जबकि अत्यधिक बारिश और बादल फटने जैसी घटनाओं के दौरान पानी में मिट्टी और गाद की मात्रा बढ़ सकती है। इससे जल शोधन संयंत्रों का संचालन प्रभावित होता है और कभी-कभी एहतियातन आपूर्ति रोकनी पड़ती है। वर्ष 2024 में कश्मीर में सामान्य से लगभग 80 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज होने की जानकारी देते हुए विभागीय अधिकारी ने बताया कि उस दौरान दूध गंगा में कच्चे पानी की भारी कमी का सामना करना पड़ा था। यह उदाहरण दर्शाता है कि वर्षा के बदलते स्वरूप का असर सीधे पेयजल व्यवस्था पर पड़ सकता है।
प्राकृतिक जलमार्गों पर निर्माण भी चिंता का विषय दूध गंगा के जलग्रहण क्षेत्र में बढ़ते निर्माण और नदी के प्राकृतिक रास्तों में बदलाव को भी एक चुनौती माना जा रहा है। श्रीनगर में नदी की एक पुरानी धारा के कुछ हिस्सों पर कंक्रीट के ढांचे, पार्क और अन्य निर्माण होने से प्राकृतिक जल निकासी प्रभावित हुई है। सितंबर 2014 की बाढ़ के दौरान भी पानी के बहाव और निचले इलाकों में जलभराव की समस्या सामने आई थी। दीर्घकालीन जल प्रबंधन की जरूरत विशेषज्ञों के अनुसार, कश्मीर में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए ग्लेशियरों और जलग्रहण क्षेत्रों की निगरानी, जल संरक्षण, प्राकृतिक जलमार्गों की सुरक्षा तथा पेयजल के वैकल्पिक स्रोतों का विकास जरूरी है। इसके साथ ही वर्षा जल संचयन और पानी के पुनः उपयोग को बढ़ावा देना भी महत्वपूर्ण होगा। कश्मीर के ग्लेशियरों का सिकुड़ना केवल पर्यावरणीय बदलाव नहीं, बल्कि भविष्य की पेयजल सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है। यदि बर्फबारी, तापमान और वर्षा के बदलते पैटर्न का प्रभाव जारी रहता है, तो दूध गंगा जैसी नदियों पर निर्भर आबादी के लिए पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना और अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
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