सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : भोपाल। तेज रफ्तार को मूल्य और एल्गोरिदम को पसंद का पैमाना मानने वाले दौर में Aditya Birla Fashion and Retail के हाउस से जुड़ा Jaypore दर्शकों को ठहरकर सुनने का आमंत्रण दे रहा है।

‘Karigari Ki Kahani: Keepers of the Weave’ कैंपेन के साथ Jaypore ने एक भावनात्मक ब्रांड फिल्म पेश की है, जिसमें शिल्प, संस्कृति, पत्रकारिता और सजग उद्यमिता से जुड़ी भारत की कई प्रभावशाली महिला आवाजों को साथ लाया गया है। कैंपेन में लेखिका Karuna Ezara Parikh, क्रिएटिव डायरेक्टर और स्टाइलिस्ट Devanshi Tuli, फैशन एडिटर Praachi Raniwala, गायिका और गीतकार Lothika Jha तथा Alka Sharma शामिल हैं, जो राजस्थान की समृद्ध हस्तशिल्प परंपराओं से जुड़ी पारंपरिक Dabu क्राफ्ट यूनिट चलाती हैं।

‘Karigari Ki Kahani’ सिर्फ उत्सव नहीं, बल्कि कारीगरी को स्मृति, पहचान, श्रम और विरासत के रूप में देखने वाली बातचीत है। फिल्म में महिलाएं उन पलों को याद करती हैं, जब वे पहली बार शिल्प से जुड़ीं – किसी वस्तु की तरह नहीं, बल्कि विरासत की तरह। दादी की साड़ी की खुशबू हो या धूप में सूखते Dabu ब्लॉक प्रिंट को देखने की रीत, फिल्म कारीगरी को स्पर्श और भावनाओं से बने जीवित अनुभव के रूप में सामने लाती है। हालांकि यह कहानी केवल अतीत की यादों तक सीमित नहीं है।

कैंपेन पर Sooraj Bhat, Chief Executive Officer, Premium Ethnic Business, ABFRL ने कहा, “Karigari Ki Kahani भारतीय शिल्प को लेकर बातचीत को उपभोग से गहरे जुड़ाव की ओर मोड़ने की हमारी कोशिश है। हम ऐसा मंच बनाना चाहते थे, जो हस्तनिर्मित वस्तुओं की सुंदरता ही नहीं, बल्कि उनके पीछे मौजूद लोगों, स्मृतियों और जीवन-अनुभवों का भी सम्मान करे। Jaypore में हमारा हमेशा से विश्वास रहा है कि शिल्प दुनिया को देखने का एक तरीका है। आज, जब हम 40+ क्राफ्ट क्लस्टर्स में 2,500+ शिल्प परिवारों के साथ काम कर रहे हैं और भारत भर की 39 विशिष्ट कलाओं का उत्सव मना रहे हैं, हमारी प्रतिबद्धता इन जीवित परंपराओं को आधुनिक महिला के लिए संरक्षित करने और आगे बढ़ाने में निहित है – ऐसी महिला, जो अपने जीवन, पहनावे और अभिव्यक्ति में अर्थ, व्यक्तिगत पहचान और सांस्कृतिक जुड़ाव को महत्व देती है। Karigari Ki Kahani के जरिए हम शिल्प को केवल दिखाने से आगे बढ़कर सच में सुनना चाहते थे – उन कारीगरों को, जो इसे जीवित रखते हैं, और उन आधुनिक महिलाओं को, जिन्होंने इसे अपनाया, इस पर सवाल किए और इसके भविष्य को आकार देती रही हैं।”

इसी के साथ यह कैंपेन एक जरूरी सवाल उठाता है कि रफ्तार और बड़े पैमाने के इस दौर में शिल्प का अर्थ क्या है। कारीगरों की आवाजों को केंद्र में रखकर फिल्म उन्हें सप्लाई चेन के अदृश्य योगदानकर्ताओं के बजाय संस्कृति के रचयिता के रूप में प्रस्तुत करती है। यह परंपरा को बचाए रखने और समकालीन मांगों को पूरा करने के नाजुक संतुलन को टटोलती है, साथ ही शिल्प इकोसिस्टम में अधिक मान्यता, रचनात्मक स्वामित्व और न्यायपूर्ण मूल्य की जरूरत को रेखांकित करती है।


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