मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच ईरान की स्थिति को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, कमजोर पड़ने के बावजूद ईरान युद्ध को लंबा खींचने की रणनीति अपना रहा है। इसका मुख्य कारण सीधे तौर पर हार मानने से बचना और दुश्मन पर दबाव बनाए रखना है।
ईरान की रणनीति “कॉस्ट इम्पोजिशन” यानी युद्ध को महंगा बनाकर विरोधी को थकाने की मानी जा रही है। इस रणनीति के तहत वह सीधे बड़े हमलों के बजाय छोटे-छोटे हमलों, प्रॉक्सी ग्रुप्स और क्षेत्रीय सहयोगियों के जरिए संघर्ष को जारी रखता है। इससे विरोधी देश को लंबे समय तक संसाधन और सैन्य ताकत खर्च करनी पड़ती है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि ईरान के लिए सरेंडर करना राजनीतिक और रणनीतिक रूप से बड़ा झटका होगा। इससे उसकी क्षेत्रीय साख और प्रभाव कमजोर हो सकता है। इसलिए वह जंग को लंबा खींचकर अपने विरोधियों को थकाने और अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
इसके अलावा, ईरान को उम्मीद है कि लंबे संघर्ष से वैश्विक शक्तियां हस्तक्षेप करेंगी और कूटनीतिक समाधान की दिशा में दबाव बनेगा। इस तरह वह अपनी शर्तों पर बातचीत करने की स्थिति में आ सकता है।
कुल मिलाकर, कमजोर स्थिति के बावजूद ईरान की यह रणनीति समय हासिल करने, विरोधियों को थकाने और अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश के रूप में देखी जा रही है।
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