आज की वैश्विक राजनीति केवल सैन्य शक्ति, आर्थिक निवेश और रणनीतिक गठबंधनों तक सीमित नहीं रह गई है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है, जहां मानवीय सहयोग, आपदा प्रबंधन, स्वास्थ्य सहायता और विश्वास निर्माण जैसे तत्व पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं। ऐसे समय में भारत ने दक्षिण एशिया में जिस प्रकार अपनी कूटनीतिक भूमिका को विकसित किया है, वह दुनिया के सामने एक अलग मॉडल प्रस्तुत करता है। हाल ही में कांग्रेस सांसद शशि थरूर द्वारा मालदीव को भारत की जल सहायता का उदाहरण देते हुए की गई टिप्पणी ने इसी मॉडल को नई चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
थरूर ने अपने संबोधन में कहा कि भारत ने मालदीव के साथ राजनीतिक मतभेदों और “इंडिया आउट” अभियान के बावजूद जल संकट के समय मदद पहुंचाकर यह साबित किया कि वास्तविक कूटनीति विश्वास पर आधारित होती है। यह टिप्पणी केवल एक राजनीतिक बयान नहीं थी, बल्कि भारत की विदेश नीति की उस गहरी सोच को सामने लाती है जिसमें शक्ति के साथ संवेदनशीलता भी शामिल है।
मालदीव संकट: राजनीति से ऊपर मानवीय दृष्टिकोण
मालदीव पिछले कुछ वर्षों से दक्षिण एशिया की रणनीतिक राजनीति का केंद्र बना हुआ है। हिंद महासागर में स्थित यह छोटा द्वीपीय देश सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। चीन और भारत दोनों की नजर इस क्षेत्र पर बनी रहती है क्योंकि यह समुद्री व्यापार और सुरक्षा के लिहाज से अहम स्थान रखता है।
राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू के सत्ता में आने के बाद मालदीव में भारत-विरोधी राजनीतिक माहौल तेज हुआ। चुनाव प्रचार में “इंडिया आउट” अभियान का व्यापक उपयोग किया गया। भारतीय सैन्य उपस्थिति को मुद्दा बनाया गया और नई सरकार ने चीन के साथ नजदीकी बढ़ाने के संकेत दिए। स्वाभाविक रूप से इससे भारत-मालदीव संबंधों में तनाव की स्थिति बनी।
लेकिन इसी दौरान जब माले शहर में जल संकट पैदा हुआ और लाखों लोगों के सामने पेयजल की समस्या खड़ी हो गई, तब भारत ने तत्काल राहत पहुंचाई। भारतीय नौसेना और वायुसेना के माध्यम से बड़ी मात्रा में पीने का पानी भेजा गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि भारत ने इस सहायता को किसी राजनीतिक शर्त या दबाव से नहीं जोड़ा।
यही वह क्षण था जिसने भारत की विदेश नीति को एक अलग पहचान दी। यह केवल रणनीतिक हस्तक्षेप नहीं था, बल्कि एक ऐसा संदेश था कि भारत अपने पड़ोसियों को संकट के समय अकेला नहीं छोड़ता, चाहे राजनीतिक मतभेद कितने भी क्यों न हों।
भारत की विदेश नीति का बदलता स्वरूप
स्वतंत्रता के बाद भारत की विदेश नीति मुख्य रूप से गुटनिरपेक्षता, शांति और सह-अस्तित्व के सिद्धांतों पर आधारित रही। लेकिन 21वीं सदी में बदलते वैश्विक समीकरणों ने भारत को अधिक सक्रिय और व्यावहारिक कूटनीति अपनाने के लिए प्रेरित किया। अब भारत केवल वैश्विक मंचों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय संकटों में समाधान देने वाले देश के रूप में भी उभर रहा है।
“Neighbourhood First” नीति इसी सोच का हिस्सा है। इस नीति का उद्देश्य केवल पड़ोसी देशों के साथ आर्थिक संबंध मजबूत करना नहीं, बल्कि उन्हें यह विश्वास दिलाना है कि भारत क्षेत्रीय स्थिरता और सहयोग के लिए प्रतिबद्ध है।
नेपाल में भूकंप के दौरान भारत द्वारा चलाया गया राहत अभियान, श्रीलंका के आर्थिक संकट में वित्तीय और मानवीय सहायता, कोविड महामारी के दौरान वैक्सीन मैत्री अभियान और अफगानिस्तान तक मानवीय सहायता पहुंचाना—ये सभी उदाहरण बताते हैं कि भारत धीरे-धीरे एक “रिस्पॉन्सिबल रीजनल पावर” के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर रहा है।
चीन बनाम भारत: दो अलग कूटनीतिक मॉडल
दक्षिण एशिया में चीन की बढ़ती मौजूदगी भारत के लिए लगातार चुनौती बनी हुई है। चीन बड़े पैमाने पर ऋण, इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं और आर्थिक निवेश के जरिए छोटे देशों में प्रभाव बढ़ाने की कोशिश करता है। बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
हालांकि कई देशों में चीनी निवेश ने आर्थिक विकास को गति दी है, लेकिन इसके साथ ऋण निर्भरता और रणनीतिक दबाव की चिंताएं भी बढ़ी हैं। श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह का उदाहरण अक्सर इस संदर्भ में दिया जाता है।
इसके विपरीत भारत का दृष्टिकोण अपेक्षाकृत संतुलित और मानवीय दिखाई देता है। भारत की सहायता नीति का उद्देश्य केवल प्रभाव बढ़ाना नहीं बल्कि स्थायी साझेदारी बनाना है। भारत जानता है कि छोटे देशों के साथ संबंध केवल आर्थिक निवेश से मजबूत नहीं होते, बल्कि जनता के विश्वास से मजबूत होते हैं।
मालदीव में जल संकट के समय भारत की सहायता इसी रणनीतिक सोच का हिस्सा थी। यह सहायता केवल पानी पहुंचाने तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह संदेश भी था कि भारत क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भरोसेमंद साझेदार बना रहेगा।
“सॉफ्ट पावर” से “ह्यूमैनिटेरियन पावर” तक
भारत को लंबे समय से अपनी संस्कृति, योग, लोकतंत्र, सिनेमा और आध्यात्मिक परंपराओं के कारण “सॉफ्ट पावर” माना जाता रहा है। लेकिन अब भारत एक नई वैश्विक पहचान भी विकसित कर रहा है—“ह्यूमैनिटेरियन पावर” यानी मानवीय शक्ति।
कोविड महामारी के दौरान भारत ने दुनिया के कई देशों को वैक्सीन और दवाइयां उपलब्ध कराईं। अफ्रीका, एशिया और कैरेबियाई देशों तक भारतीय सहायता पहुंची। इससे भारत की छवि केवल एक उभरती अर्थव्यवस्था की नहीं बल्कि संकट में मदद करने वाले देश की बनी।
आज जलवायु परिवर्तन, जल संकट, महामारी और प्राकृतिक आपदाएं पूरी दुनिया के लिए बड़ी चुनौती बन चुकी हैं। आने वाले समय में वही देश प्रभावशाली होंगे जो इन संकटों में नेतृत्व की भूमिका निभा सकेंगे। भारत के पास यह अवसर भी है और जिम्मेदारी भी।
विपक्ष की सराहना और लोकतांत्रिक परिपक्वता
इस पूरे घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि भारत की विदेश नीति के सकारात्मक पक्ष की सराहना विपक्षी नेता शशि थरूर द्वारा की गई। लोकतंत्र में राजनीतिक मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन विदेश नीति ऐसे विषयों में से है जहां राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देना आवश्यक होता है।
थरूर स्वयं संयुक्त राष्ट्र में लंबे समय तक कार्य कर चुके हैं और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की गहरी समझ रखते हैं। ऐसे में उनका यह कहना कि “भारत विश्वास बनाकर नेतृत्व करता है” भारतीय विदेश नीति के लिए महत्वपूर्ण समर्थन माना जा सकता है।
यह भारत के लोकतांत्रिक ढांचे की मजबूती भी दर्शाता है कि राष्ट्रीय हितों से जुड़े मुद्दों पर अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं के बावजूद सहमति बन सकती है।
हिंद महासागर में भारत की रणनीतिक भूमिका
मालदीव का महत्व केवल एक पड़ोसी देश होने तक सीमित नहीं है। हिंद महासागर क्षेत्र वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री सुरक्षा का केंद्र बनता जा रहा है। चीन की बढ़ती समुद्री सक्रियता ने इस क्षेत्र को और संवेदनशील बना दिया है।
भारत के लिए मालदीव, श्रीलंका, मॉरीशस और सेशेल्स जैसे देशों के साथ मजबूत संबंध बनाए रखना रणनीतिक दृष्टि से बेहद आवश्यक है। लेकिन भारत यह समझ चुका है कि केवल सैन्य या आर्थिक शक्ति से स्थायी प्रभाव नहीं बनाया जा सकता। क्षेत्रीय सहयोग, विश्वास और संवेदनशीलता ही लंबे समय तक प्रभाव बनाए रखने का सबसे प्रभावी तरीका है।
भविष्य की कूटनीति: भरोसे का युग
21वीं सदी की कूटनीति अब पारंपरिक शक्ति संतुलन से आगे बढ़ चुकी है। अब देशों का मूल्यांकन इस आधार पर भी होगा कि वे वैश्विक संकटों में कितनी जिम्मेदारी निभाते हैं।
जल संकट, पर्यावरणीय आपदाएं, महामारी और खाद्य सुरक्षा जैसे मुद्दे भविष्य की राजनीति को प्रभावित करेंगे। ऐसे समय में भारत यदि अपनी मानवीय सहायता और क्षेत्रीय सहयोग की नीति को लगातार मजबूत करता है, तो वह केवल दक्षिण एशिया ही नहीं बल्कि वैश्विक दक्षिण (Global South) के देशों के लिए भी नेतृत्वकारी भूमिका निभा सकता है।
निष्कर्ष
मालदीव को भारत की जल सहायता एक छोटी घटना नहीं थी। यह आधुनिक भारतीय कूटनीति के उस स्वरूप का प्रतीक थी जिसमें शक्ति और संवेदनशीलता दोनों का संतुलन दिखाई देता है। यह घटना बताती है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में स्थायी प्रभाव केवल आर्थिक निवेश या सैन्य ताकत से नहीं बनता, बल्कि भरोसे और मानवीय सहयोग से बनता है।
भारत आज जिस दिशा में आगे बढ़ रहा है, वह उसे केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं बल्कि नैतिक और मानवीय नेतृत्व वाली वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित कर सकता है। यदि भारत अपनी “Neighbourhood First” और “Human-Centric Diplomacy” की नीति को इसी निरंतरता के साथ आगे बढ़ाता है, तो आने वाले वर्षों में दक्षिण एशिया में उसकी भूमिका और अधिक मजबूत और निर्णायक होगी।
कूटनीति की दुनिया में सबसे बड़ा हथियार भय नहीं, बल्कि विश्वास होता है—और भारत धीरे-धीरे इसी विश्वास की शक्ति को अपनी सबसे बड़ी पहचान बना रहा है।
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