सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस / आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के भोपाल परिसर मे गुरुपूर्णिमा महोत्सव व्यास पूजन कार्यक्रम का आयोजन किया गया । इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि सदानंद दामोदर सप्रे, सदस्य, प्रज्ञा प्रवाह- राष्ट्रीय कार्यकारिणी ,राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं गुरुमूर्ति ब्रह्मचारिणी कात्यायिनी आचार्य , चिन्मय मिशन, भोपाल एवं परिसर निदेशक प्रो.रमाकांत पांडेय जी उपस्थित रहे। इस अवसर पर परिसर के छात्र-छात्राओ और अध्यापकों द्वारा शोभा यात्रा निकाली गई ।

इस अवसर पर मुख्य अतिथि ने अपने उद्बोधन में कहा कि, यह पर्व उत्सव की तरह मनाया जाना चाहिए जिससे इसके महत्व को समाज के लोगो तक पहुचाया जाए । भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ने के लिए ऐसे आयोजन होना आवश्यक है तथा हमारी संस्कृति और सभ्यता को जीवित रखने के लिए ज़रूरी है। उन्होंने कहा कि यदि शिष्य नहीं तो गुरु का भी कोई औचित्य नहीं है ।प्रत्येक शिक्षक को गुरु बनने का प्रयास करना चाहिए |अपने छोटे , बड़े से कुछ भी सीखने की प्रवृत्ति शिष्य मै होनी चाहिए । गुरु अपने आचरण से भी बहुत कुछ सिखाता है । आचार्य गुरुमूर्ति ब्रह्मचारिणी कात्यायिनी ने अपने वक्तव्य मैं कहा कि हमारी माता प्रथम गुरु है । गुरु पूर्णिमा गुरु के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर है ।
ब्रह्मा, विष्णु,महेश तीनो का वास गुरु मै है । गुरु मार्गदर्शक है जो हमारी कमियों को दूर जड़ने की कोशिश करता है ।कार्यक्रम के अध्यक्ष परिसर निदेशक रमाकांत पांडेय ने कहा कि गुरु पर्व किसी भी शिक्षण संस्थान का सबसे बड़ा पर्व है । संसार की व्यवहारिकता को समझना भी शिक्षा है । देव, गंधर्भ के दयारा जिसकी स्तुति की जाती है वह गुरु है । गुरु शब्द की अनेक व्याख्याये है। माता ,पिता, दादा दादी, नाना, नानी, बड़ा भाई, ससुर, मामा भी गुरु की श्रेणी में शामिल है इन सभी का , मर्म , वाणी से इन सभी का अनुवर्तन करना चाहिए । गुरु नित्य, नैमित्य , छात्र प्रिय , सहृदयी होना चाहिए। भारतीय ज्ञान परंपरा को संजोकर रखने का दायित्व गुरु का है । इस अवसर पर परिसर के समस्त प्राध्यापकों को सम्मानित किया गया ।
कार्यक्रम का संचालन नरसिंहलु ने किया । वाचिक स्वागत प्रो सुबोध शर्मा ने एवं प्रो .सनंदन त्रिपाठी जी ने धन्यवाद ज्ञापित किया ।
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