आज के डिजिटल युग में किशोर तेजी से सोशल मीडिया के प्रभाव में आ रहे हैं, जिससे “डिजिटल नशा” एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर मिलने वाले लाइक्स, कमेंट्स और नोटिफिकेशन्स दिमाग में डोपामिन का स्राव बढ़ाते हैं, जिससे व्यक्ति को बार-बार वही अनुभव पाने की इच्छा होती है। यही प्रक्रिया किशोरों को इस जाल में फंसा देती है।

किशोरावस्था में मस्तिष्क का विकास जारी रहता है, ऐसे में लगातार स्क्रीन टाइम और सोशल मीडिया की लत उनके मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है। इससे ध्यान में कमी, नींद की समस्या, आत्मविश्वास में गिरावट और सामाजिक अलगाव जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं।

विशेषज्ञ बताते हैं कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि उपयोगकर्ता अधिक समय तक जुड़े रहें। यह एल्गोरिदम आधारित कंटेंट और नोटिफिकेशन सिस्टम किशोरों को आकर्षित करते हैं और धीरे-धीरे उन्हें आदत में बदल देते हैं।

माता-पिता और शिक्षकों की भूमिका इस स्थिति में बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। बच्चों के स्क्रीन टाइम को सीमित करना, उन्हें आउटडोर गतिविधियों के लिए प्रेरित करना और डिजिटल उपयोग के प्रति जागरूक करना आवश्यक है।

सरकार और शैक्षणिक संस्थानों को भी इस दिशा में जागरूकता अभियान चलाने चाहिए, ताकि किशोरों को डिजिटल संतुलन का महत्व समझाया जा सके।

कुल मिलाकर, सोशल मीडिया का उपयोग पूरी तरह से नकारात्मक नहीं है, लेकिन इसका संतुलित उपयोग जरूरी है। डिजिटल नशे से बचने के लिए जागरूकता और आत्मनियंत्रण ही सबसे प्रभावी उपाय हैं।

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