सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : दिल्ली हाईकोर्ट ने तलाक से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि पति-पत्नी के बीच तलाक के लिए एक साल तक अलग-अलग रहना हमेशा जरूरी शर्त नहीं है। अदालत ने कहा कि यदि विवाह पूरी तरह टूट चुका है और दोनों के बीच भावनात्मक व सामाजिक संबंध समाप्त हो चुके हैं, तो किसी को भी अनचाहे रिश्ते में जबरन उलझाए रखना गलत है।

कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि विवाह केवल कानूनी बंधन नहीं, बल्कि आपसी समझ, सम्मान और सहमति पर आधारित होता है। जब यह सभी तत्व समाप्त हो जाएं और साथ रहने की कोई संभावना न बचे, तब सिर्फ कानूनी औपचारिकताओं के नाम पर पति या पत्नी को रिश्ते में बांधे रखना अन्यायपूर्ण है।

हाईकोर्ट के अनुसार, ऐसे मामलों में अदालतों को वास्तविक परिस्थितियों को देखते हुए मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। लंबे समय से अलग रह रहे दंपती, जिनके बीच कोई संवाद या साथ रहने की इच्छा नहीं है, उनके लिए तलाक को अनावश्यक रूप से टालना मानसिक पीड़ा बढ़ा सकता है।

यह फैसला उन दंपतियों के लिए राहत भरा माना जा रहा है, जो लंबे समय से तनावपूर्ण विवाह में फंसे हुए हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भविष्य में पारिवारिक कानून से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा और तलाक प्रक्रिया को अधिक व्यावहारिक व संवेदनशील बनाएगा।

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