सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : इस्लामाबाद। खुद भारी विदेशी कर्ज और आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा पाकिस्तान अब विकासशील देशों को कर्ज प्रबंधन में सहयोग देने वाले अंतरराष्ट्रीय मंच की अगुवाई करेगा। पाकिस्तान के वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगजेब ने 12 अक्टूबर 2026 को थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक में संयुक्त राष्ट्र समर्थित ‘बॉरोअर्स प्लेटफॉर्म’ की गवर्निंग काउंसिल के अध्यक्ष का पद संभाला। इस घटनाक्रम को लेकर चर्चा है कि आर्थिक सहायता पर निर्भर रहने वाला पाकिस्तान अब दूसरे कर्जदार देशों की समस्याओं को सुलझाने में भी भूमिका निभाएगा।
क्या है बॉरोअर्स प्लेटफॉर्म? बॉरोअर्स प्लेटफॉर्म विकासशील देशों का एक साझा मंच है, जिसका उद्देश्य कर्ज लेने वाले देशों को अपनी आर्थिक चुनौतियों पर चर्चा करने, अनुभव साझा करने और कर्ज प्रबंधन की क्षमता मजबूत करने का अवसर देना है। संयुक्त राष्ट्र की संस्था व्यापार एवं विकास सम्मेलन (यूएनसीटीएडी) इस मंच के सचिवालय की जिम्मेदारी संभाल रही है। इस मंच के माध्यम से सदस्य देश कर्ज के बेहतर प्रबंधन, आर्थिक सुधारों और विकास परियोजनाओं के लिए वित्त जुटाने के नए तरीकों पर विचार कर सकते हैं। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था में कर्ज लेने वाले देशों की आवाज को मजबूती देना भी है।
खुद पाकिस्तान पर कितना कर्ज? पाकिस्तान लंबे समय से आर्थिक संकट और विदेशी वित्तीय सहायता की जरूरत से जूझ रहा है। वर्ष 2023 में देश को संप्रभु ऋण चूक यानी कर्ज चुकाने में असमर्थ होने की स्थिति से बचने के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से तीन अरब डॉलर का राहत कार्यक्रम मिला था। वर्ष 2024 में आईएमएफ ने पाकिस्तान के लिए सात अरब डॉलर के एक अन्य कार्यक्रम को मंजूरी दी। आईएमएफ ने 7 अक्टूबर 2026 को पाकिस्तान के साथ समीक्षा संबंधी कर्मचारी-स्तरीय समझौते की घोषणा की। इसके तहत कार्यकारी बोर्ड की मंजूरी मिलने पर पाकिस्तान को लगभग 1.21 अरब डॉलर की अतिरिक्त सहायता उपलब्ध हो सकती है। पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक के आंकड़ों के अनुसार, मार्च 2026 के अंत तक देश का कुल बाहरी कर्ज और देनदारियां लगभग 137.55 अरब डॉलर थीं।
अध्यक्ष बनने से कर्ज माफ नहीं होगा पाकिस्तान की इस नई जिम्मेदारी का अर्थ यह नहीं है कि उसका अपना कर्ज माफ हो जाएगा या भुगतान की शर्तों में स्वतः छूट मिल जाएगी। यह मंच कर्ज पुनर्गठन पर सामूहिक बातचीत करने या वित्तीय संकट के दौरान आपात सहायता उपलब्ध कराने वाली संस्था नहीं है। इसकी भूमिका मुख्य रूप से अनुभव साझा करने, तकनीकी सहयोग बढ़ाने और कर्ज से जुड़ी समस्याओं पर साझा दृष्टिकोण विकसित करने की है।पाकिस्तान के सामने अब चुनौती यह होगी कि वह अपने अनुभवों का इस्तेमाल दूसरे विकासशील देशों के साथ सहयोग बढ़ाने में किस तरह करता है। उसकी अध्यक्षता से अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसे जिम्मेदारी जरूर मिली है, लेकिन देश की अपनी आर्थिक चुनौतियां और कर्ज चुकाने की बाध्यताएं बनी रहेंगी।
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