सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : भोपाल: भारत में तेज आर्थिक वृद्धि और बिजली की बढ़ती मांग को शहरों में बाहरी वायु प्रदूषण के बिगड़ने से जोड़ा गया है। University of Oxford के शोधकर्ताओं के नेतृत्व में किया गया यह नया अध्ययन Nature Cities में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन में पिछले दशकों के दौरान आर्थिक वृद्धि, बिजली उत्पादन, वायु प्रदूषण और स्वास्थ्य परिणामों के बीच संबंधों की पड़ताल की गई।
अध्ययन के अनुसार, 2000 से 2020 के बीच भारत की बिजली मांग लगभग चार गुना बढ़ी। इसी अवधि में कुल बिजली उत्पादन में कोयले की हिस्सेदारी करीब 76% रही। कोयला आधारित बिजली उत्पादन के विस्तार के साथ सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन बढ़ा और सल्फेट एयरोसोल तथा सूक्ष्म कण पदार्थ की सांद्रता में भी वृद्धि दर्ज की गई।
शोधकर्ताओं का अनुमान है कि PM2.5 के संपर्क से जुड़ी शहरी मौतें 2000 में करीब 6,70,000 से बढ़कर 2020 में लगभग 8,70,000 हो गईं। यह करीब 30% की वृद्धि है। प्रदूषण में सबसे अधिक बढ़ोतरी उत्तरी और पूर्वी भारत के उन क्षेत्रों में चिन्हित की गई, जहां घनी आबादी और बड़े पैमाने पर कोयला आधारित बिजली ढांचा एक-दूसरे से मिलते हैं।
अध्ययन में एक विपरीत रुझान भी सामने आया। स्वच्छ खाना पकाने के ईंधन तक अधिक पहुंच से घरों के भीतर वायु प्रदूषण का संपर्क घटा, जबकि कोयला-निर्भर बिजली उत्पादन के साथ बाहरी प्रदूषण बढ़ता गया। शोध में पाया गया कि जांची गई अवधि के दौरान शहरी एयरोसोल लोडिंग में बिजली क्षेत्र का योगदान काफी बढ़ा।
शोधकर्ताओं ने कहा कि ये निष्कर्ष बताते हैं कि भारत के आर्थिक और अवसंरचना विस्तार के साथ ऊर्जा प्रणालियों के पर्यावरणीय और स्वास्थ्य प्रभावों की गंभीरता से जांच जरूरी है।
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