सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : नई दिल्ली। धरती का बढ़ता तापमान अब केवल गर्मी और मौसम में बदलाव तक सीमित नहीं रह गया है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि वैश्विक तापमान में औद्योगिक युग से पहले के स्तर की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होने पर पृथ्वी की कई महत्वपूर्ण प्राकृतिक प्रणालियों पर गंभीर दबाव पड़ सकता है। अमेजन के विशाल वर्षावन, समुद्र में मौजूद प्रवाल भित्तियां और अटलांटिक महासागर की जलधाराएं ऐसे प्रमुख तंत्र हैं, जिनमें बड़े बदलाव का असर दुनिया के पर्यावरण और मौसम पर दूरगामी हो सकता है। पॉट्सडैम जलवायु प्रभाव अनुसंधान संस्थान के निदेशक और प्रमुख जलवायु वैज्ञानिक योहान रॉकस्ट्रॉम ने 20 अक्टूबर 2026 को रॉयटर्स के जलवायु सम्मेलन में यह चिंता जताई। उनके अनुसार, जीवाश्म ईंधन के लगातार इस्तेमाल से बढ़ता तापमान प्राकृतिक तंत्रों को उनकी महत्वपूर्ण सीमाओं के करीब पहुंचा रहा है। क्या होते हैं धरती के ‘टिपिंग पॉइंट’? जलवायु विज्ञान में ‘टिपिंग पॉइंट’ उस स्थिति को कहा जाता है, जब किसी प्राकृतिक तंत्र में बदलाव एक ऐसी सीमा तक पहुंच जाता है कि उसके बाद वह अपने पुराने स्वरूप में लौटने की क्षमता खो सकता है या उसमें बड़े और लंबे समय तक बने रहने वाले परिवर्तन शुरू हो सकते हैं।

उदाहरण के तौर पर, किसी जंगल में बढ़ता तापमान, लंबे सूखे और बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई मिलकर ऐसा बदलाव पैदा कर सकते हैं, जिससे जंगल की नमी बनाए रखने की क्षमता कमजोर हो जाए। इसके बाद सूखा और आग जंगल को और नुकसान पहुंचा सकते हैं। इस तरह बदलाव एक-दूसरे को बढ़ावा देने लगते हैं। हालांकि, सभी प्राकृतिक तंत्रों के लिए ऐसी सीमा एक समान नहीं होती। वैज्ञानिकों के बीच इन सीमाओं के सटीक तापमान और बदलाव की गति को लेकर अभी भी अनिश्चितता है। अमेजन के जंगलों पर बढ़ता खतरा दक्षिण अमेरिका में फैला अमेजन वर्षावन दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्रों में शामिल है। यह वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करने, जैव विविधता को बनाए रखने और क्षेत्रीय वर्षा चक्र को सहारा देने में अहम भूमिका निभाता है। लेकिन बढ़ता तापमान, बार-बार पड़ने वाला सूखा, जंगलों में आग और पेड़ों की कटाई इसकी प्राकृतिक क्षमता को कमजोर कर रहे हैं। जंगलों से नमी वायुमंडल में पहुंचती है और वर्षा चक्र को बनाए रखने में मदद करती है। यदि बड़े क्षेत्र में वन नष्ट होते हैं, तो वर्षा का स्वरूप बदल सकता है और सूखे की स्थिति अधिक गंभीर हो सकती है।

वर्ष 2026 में नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन ने संकेत दिया कि तापमान वृद्धि और बड़े पैमाने पर वनों की कटाई का संयुक्त प्रभाव अमेजन के बड़े हिस्से को गंभीर पारिस्थितिक बदलाव की ओर धकेल सकता है। अध्ययन में 1.5 से 1.9 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि की सीमा के साथ 22 से 28 प्रतिशत वनों की कटाई वाले परिदृश्य में अमेजन के 62 से 77 प्रतिशत क्षेत्र में व्यापक बदलाव का जोखिम सामने आया। यह एक मॉडल आधारित अनुमान है, न कि इस बात की निश्चित भविष्यवाणी कि पूरा क्षेत्र इसी तरह बदल जाएगा। समुद्र की प्रवाल भित्तियां भी संकट में समुद्र में पाई जाने वाली प्रवाल भित्तियां हजारों समुद्री प्रजातियों के लिए भोजन, आश्रय और प्रजनन का स्थान हैं। लेकिन समुद्र का तापमान बढ़ने से प्रवालों पर गंभीर असर पड़ता है। अत्यधिक गर्म पानी के कारण प्रवाल अपने ऊतकों में रहने वाले सहजीवी शैवाल को खो सकते हैं। इस प्रक्रिया को ‘कोरल ब्लीचिंग’ कहा जाता है।

यदि समुद्र का तापमान लंबे समय तक अधिक बना रहे, तो प्रवाल कमजोर होकर मर सकते हैं। इससे समुद्री जैव विविधता, मछली पालन और उन तटीय समुदायों की आजीविका प्रभावित हो सकती है, जो इन पारिस्थितिकी तंत्रों पर निर्भर हैं। रॉकस्ट्रॉम ने चेताया है कि कई प्रवाल भित्तियां ऐसे दबाव का सामना कर रही हैं, जिससे उनकी क्षति को पलटना कठिन हो सकता है। अटलांटिक महासागर की जलधाराओं में बदलाव की आशंका अटलांटिक महासागर में पानी के प्रवाह की एक विशाल प्रणाली दुनिया के ताप और वर्षा वितरण को प्रभावित करती है। इसे अटलांटिक मेरिडियोनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन (एएमओसी) कहा जाता है। यह प्रणाली गर्म पानी को उत्तर की ओर ले जाने और ठंडे, अधिक घने पानी के नीचे की ओर जाने की प्रक्रिया से जुड़ी है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्रीनलैंड की बर्फ पिघलने और समुद्र में मीठे पानी की मात्रा बढ़ने से पानी के घनत्व और समुद्री परिसंचरण पर असर पड़ सकता है। यदि यह प्रणाली काफी कमजोर होती है, तो यूरोप के कुछ हिस्सों के मौसम, उष्णकटिबंधीय वर्षा पट्टियों और अन्य क्षेत्रों के जल चक्र में महत्वपूर्ण बदलाव हो सकते हैं।

हालांकि, एएमओसी के भविष्य में संभावित बदलाव की सीमा और उसके समय को लेकर वैज्ञानिक अनिश्चितता बनी हुई है। जलवायु आकलनों में इस प्रणाली के कमजोर होने की आशंका जताई गई है, लेकिन इसके अचानक पूरी तरह ठप होने की संभावना और समय को निश्चित रूप से बताना संभव नहीं है। 1.5 डिग्री का मतलब हर जगह इतनी गर्मी नहीं वैज्ञानिकों की चेतावनी को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि 1.5 डिग्री सेल्सियस का आंकड़ा पूरी दुनिया के औसत सतही तापमान में औद्योगिक युग से पहले के स्तर की तुलना में वृद्धि को दर्शाता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि पृथ्वी के हर शहर या क्षेत्र का तापमान ठीक 1.5 डिग्री बढ़ जाएगा। किसी एक वर्ष में वैश्विक औसत तापमान का 1.5 डिग्री से ऊपर पहुंच जाना और लंबे समय तक तापमान का इस स्तर पर बने रहना अलग-अलग बातें हैं। जलवायु लक्ष्यों का आकलन सामान्यतः कई वर्षों के औसत के आधार पर किया जाता है। इसके बावजूद, हर अतिरिक्त तापमान वृद्धि के साथ लू, समुद्री गर्मी, भारी वर्षा और कुछ क्षेत्रों में सूखे का खतरा बढ़ सकता है।

उत्सर्जन घटाने के साथ प्रकृति बचाना भी जरूरी रॉकस्ट्रॉम के अनुसार, जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए केवल कार्बन उत्सर्जन घटाना पर्याप्त नहीं होगा। जंगलों, जैव विविधता और मीठे पानी के स्रोतों को सुरक्षित रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। कोयले, पेट्रोल और डीजल जैसे जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने के साथ प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को विकास योजनाओं का हिस्सा बनाना होगा। संयुक्त राष्ट्र का जलवायु सम्मेलन कॉप-31 नवंबर 2026 में आयोजित होना है। ऐसे में उत्सर्जन में कटौती, प्रकृति संरक्षण और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के उपायों पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग महत्वपूर्ण रहेगा। धरती के प्राकृतिक तंत्र एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। अमेजन के जंगलों की सेहत, समुद्र में प्रवाल भित्तियों का अस्तित्व और अटलांटिक महासागर की जलधाराएं केवल अलग-अलग पर्यावरणीय मुद्दे नहीं हैं। इन पर पड़ने वाला दबाव व्यापक जलवायु व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। वैज्ञानिकों का संदेश है कि उत्सर्जन में तेजी से कटौती और प्रकृति का संरक्षण भविष्य के जोखिमों को कम करने के लिए निर्णायक कदम होंगे।


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