केवल कुछ साल पहले तक शुगर के मरीजों को दिन में कई बार सुई चुभा कर रक्त शर्करा का परीक्षण करना पड़ता था लेकिन अब बिना ब्लड टेस्ट किये बाहर त्वचा से ही रोगी के कैंसर,ग्लुकोज, कोलेस्टरॉल, यूरिक अम्ल, को पहचान कर सटीक आकलन किया जा जा रहा है । ये होता है रक्त के रंग की पहचान से जिसे रमन स्पेक्ट्रम तकनीक से समझा जाता है। ना केवल कैंसर के पहचान बल्कि उपचार में रमन प्रभाव का उपयोग नॉन-इनवेसिव non-invasive (बिना किसी सर्जरी या अंदरूनी उपकरणों) तकनीक के रूप में हो रहा है। दरअसल विज्ञान और वैज्ञानिक दोनों का अंतिम उद्देश्य मानव कल्याण ही है। जब कोई खोज व आविष्कार मानव सभ्यता के लिये हितकर हो तब उसे अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व पर स्वीकार किया जाना नई पीढ़ी को प्रेरित करता है।
रमन प्रभाव एक ऐसी ही वैज्ञानिक खोज है, जिसे भारतीय भौतिक विज्ञानी श्री चंद्रशेखर वेंकट रमन ने 1928 में किया था। यह शोध की दिशा की रोचक कहानी है। प्रसिद्ध भौतिकशास्त्री सी. वी. रमन का जन्म 7 नवंबर, 1888 को तमिलनाडु के त्रिचिरापल्ली के एक सामान्य परिवार में हुआ। अपने प्रतिभा शाली बचपन जीते हुए स्नातकोत्तर पूर्ण करते ही एक समान्य युवा की तरह सरकारी नौकरी के लिए आवेदन किया।1907 में असिस्टेंट एकाउटेंट जनरल की सरकारी नौकरी प्राप्त कर कलकत्ते चले गए। यही वर्ष उनके विवाह का भी था और जीवन सामान्य गति से चलने लगा।
लेकिन रमन साधारण जीवन के लिए नहीं बने थे एक दिन कार्यालय से वापस आते समय रास्ते में एक साइन बोर्ड देखा, जिस पर लिखा था ‘वैज्ञानिक अध्ययन के लिए भारतीय परिषद (इंडियन अशोसिएशन फार कल्टीवेशन आफ़ साईंस)’। मानो उनकी जिंदगी को नई दिशा मिल गई ।जीवन में कई घटनाओं पर व्यक्ति का नियंत्रण नहीं होता है वह अनंतचेतना द्वारा नियंत्रित होती हैं।और कुछ ही ऐसी असाधारण प्रतिभा होती है जो ज्ञान को अपने चिंतन और सृजन शीलता से नए रंग में ढाल कर चिर कालिक कर देती है। रमन उनमे से ही हैं ।वो तत्काल परिषद् कार्यालय में पहुँच गए। वहाँ पहुँच कर अपना परिचय दिया और परिषद् की प्रयोगशाला में प्रयोग करने की आज्ञा पा ली। भौतिक और गणित में शोध की रुचि के कारण अपनी अधिकारी की नौकरी छोड़ कर 1917 में कलकत्ता में प्रोफेसर पद को स्वीकार किया था। उस समय वो भारतीय वाद्य यंत्र और उसकी ध्वनि के विज्ञान पर शोध कर रहे थे। पाश्चात्य और भारतीय वाद्ययंत्र पर उनका अध्ययन चल रहा था। उनका परिवार संगीत में पारंगत था पिता चन्द्रशेखर अय्यर वायलिन वादक थे, पत्नि लोकसुंदरी अम्मल वीणा बजाने में सिद्ध हस्त थी ,माँ पार्वती संस्कृत की जानकार थीं, और रमन स्वयं मृदंगम बजाते थे ।संगीत ,संस्कृत और वाद्ययंत्रों के विज्ञान पर भारतीय ज्ञान परंपराओं और वाद्ययंत्र पर अपनी आस्था रखते हुए उनके शोध चल रहे थे। वायलिन की ध्वनि और विभिन्न ढोलकों की ध्वनि पर उनका शोधपत्र विश्व की प्रमुख विज्ञान पत्रिका नेचर में छपा। पुनः तार वाले वाद्ययंत्रों पर उनका शोध 1921 में प्रकाशित हुआ, जिसमें वीणा और तानपुरा का वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया था। ये शोध पत्र इतने रोचक और प्रामाणिक थे की 1926 में जर्मनी में विज्ञान के विश्वकोष के प्रकाशन की योजना बनी, तो उस विश्वकोष में” वाद्य यंत्रों की भौतिकी” के शीर्षक से लेखन के लिए एकमात्र गैर-यूरोपीय श्री रमन को आमंत्रित किया गया। और विश्वकोश का एक पूरा अध्याय लिखवाया गया। लंदन में ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के विश्वविद्यालयों के कांग्रेस में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिये सी. वी. रमन 1921 में ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय आमंत्रित किया गया। यह यात्रा उनके जीवन में एक नया मोड़ लाने वाली यात्रा साबित हुई। जहाज की यात्रा ने लगातार चिंतन करने का समय दिया वे सागर के नीले रंग व आकाश के नीले रंग को लेकर सोचने लगे कि इनका रंग नीला ही क्यों है? इससे पूर्व वैज्ञानिकों की मान्यता थी आकाश का प्रतिबिम्ब पानी पर पड़ता है इसलिए सागर भी नीला दिखता है । पर रमन इस व्याख्या से संतुष्ट नहीं थे।वह लगातार सोच रहे थे यह उनके शोध के लिये एक नया विषय बन गया था। ब्रिटेन से लौटने के पश्चात वे इसी विषय पर शोध में जुटे।
रमन प्रभाव के अनुसार, जब एक प्रकाश की किरण किसी पारदर्शी पदार्थ ( पानी, कांच या गैस) से गुजरती है, तो उस प्रकाश की रंगीनता में कुछ बदलाव आता है। इसका अर्थ ये है कि जब प्रकाश एक पदार्थ से टकराता है, तो उसकी ऊर्जा में थोड़ा परिवर्तन हो जाता है, जिससे प्रकाश का रंग बदलता है। यह परिवर्तन उस पदार्थ की विशेषताओं पर निर्भर करता है। इस खोज और उसके तार्किक उत्तर ने पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों में एक हलचल मचा दी। कई पश्चिमी वैज्ञानिकों ने इस खोज को तत्काल स्वीकार नहीं किया, लेकिन रमन ने इसे साबित करने के लिए लगातार शोध किया। उस समय भारत में उच्च श्रेणी के शोध के लिए संसाधन और सुविधाएं बहुत सीमित थीं। उनके पास अत्याधुनिक लैबोरेटरी उपकरण, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, या वित्तीय संसाधन नहीं थे जो पश्चिमी देशों के वैज्ञानिकों के पास थे। फिर भी उन्होंने अपनी कठोर मेहनत और प्रतिबद्धता से रमन प्रभाव की खोज की, उस समय भारत ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन था, और भारतीयों के लिए अंतर्राष्ट्रीय मंच पर विज्ञान के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाना और अपनी खोजों को मान्यता दिलवाना एक कठिन कार्य था।1928 में चंद्रशेखर वेंकट रमन को भौतिक शास्त्र के नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था, लेकिन उनके बजाय मशहूर ब्रिटिश भौतिक विज्ञानी ओवेन रिचर्डसन को पुरस्कार मिला ।1929 में भी चंद्रशेखर वेंकट रमन नामांकित होने के बाद पुरस्कार से वंचित रह गए थे और फ्रांस के भौतिक विज्ञानी लुई डी ब्रोगली को नोबेल पुरस्कार मिला।अंततः 1930 में उन्हें नोबेल पुरस्कार के लिये चुना गया, जो उनकी कड़ी मेहनत और संघर्ष और धैर्य का फल था।
विपरीत परिस्थितियों में जाने के लिए या कठिन काम करने के लिए थोड़ी सी योग्यता और बहुत सारे साहस की जरूरत होती है। अल्बर्ट आइंस्टीन का ये कथन सर वेंकटरमन के लिए हैं।
आज रमन प्रभाव का उपयोग कई जगह पर हो रहा है।भारत से अंतरिक्ष मिशन चंद्रयान ने चांद पर पानी होने की घोषणा की गई तो इसके पीछे रमन स्पैक्ट्रोस्कोपी का ही कमाल था। 28 फरवरी को विज्ञान दिवस के रूप में मान्यता 1986 में मिली। यह दिन भारतीय वैज्ञानिकों के महान योगदान और उनके कार्यों को सम्मानित करने के लिए मनाया जाता है। खासतौर पर, इस दिन को सर सी.वी. रमन की रमन प्रभाव की खोज के लिए याद किया जाता है।
‘विकसित भारत के लिए विज्ञान और नवाचार में वैश्विक नेतृत्व के लिए भारतीय युवाओं को सशक्त बनाना’. इस थीम के साथ 2025 का विज्ञान दिवस मनाया जाना है।
( मेधा बाजपेई )

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