बिहार में हाल ही में संपन्न मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया को लेकर गहरी चिंताएं उभरी हैं। लाखों वैध मतदाताओं के नाम बिना सूचना या सहमति के हटाए जाने की खबरें सामने आ रही हैं। जिन परिवारों में कोई एक सदस्य प्रवास पर गया, वहां पूरे परिवार का नाम सूची से गायब पाया गया। कई स्थानों पर बूथ लेवल अधिकारियों (BLOs) ने घर-घर सत्यापन किए बिना ही फ़ॉर्म-7 भर दिए — यह न सिर्फ प्रशासनिक चूक है, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन भी है।
चुनाव आयोग ने संशोधन के दौरान स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए थे कि नाम विलोपन केवल नोटिस, सत्यापन और अनुमोदन के बाद ही हो। लेकिन ज़मीनी स्तर पर BLO की भूमिका संदेह के घेरे में है। मतदाता जब NVSP पोर्टल पर नाम देखने गए या वोटर स्लिप डाउनलोड करने का प्रयास किया, तब जाकर उन्हें पता चला कि उनका नाम सूची से हट चुका है। यह पारदर्शिता और सहभागी प्रक्रिया की पूरी अवहेलना है।
और भी चिंताजनक यह है कि आयोग इस पूरे मामले पर रक्षात्मक मुद्रा में है। जब देश का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक संस्थान ही अपनी गलतियों को स्वीकार करने से इनकार कर दे, तो फिर जनता का भरोसा कैसे बचेगा? बिहार जैसे राज्य में, जहाँ सामाजिक-आर्थिक जटिलताएं, आंतरिक प्रवास और डिजिटल असमानता जैसी चुनौतियाँ पहले से मौजूद हैं, वहाँ इस तरह की प्रक्रिया को बिना ज़मीनी तैयारी के लागू करना दूरदर्शिता की कमी दर्शाता है।
इस स्थिति में सबसे ज़्यादा नुकसान उन तबकों को हुआ है जो पहले ही राजनीतिक हाशिए पर हैं — दलित, आदिवासी, ग्रामीण मतदाता। चुनावी अधिकार छीन लेने का मतलब है लोकतंत्र की आत्मा को ठेस पहुँचना।
अब यह ज़रूरी है कि चुनाव आयोग पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराए, गलत तरीके से हटाए गए नामों को तत्काल बहाल करे, और BLO प्रणाली में जवाबदेही और निगरानी को सुदृढ़ करे।
चुनाव सिर्फ तिथियों और आंकड़ों का खेल नहीं है — यह भरोसे, समावेशन और न्याय का प्रतीक होना चाहिए। बिहार में जो हुआ, वह सिर्फ एक राज्य की गलती नहीं है, वह एक राष्ट्र के लोकतांत्रिक तंत्र के लिए चेतावनी है।
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