सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : रवींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित विश्वरंग 2025 के तीसरे और अंतिम दिन का शुभारंभ एक आध्यात्मिक और मन को शीतलता प्रदान करने वाली संगीत साधना से हुआ। प्रातः आयोजित मंगलाचरण में मध्यप्रदेश के युवा और ख्यातिप्राप्त सितार वादक अनिरुद्ध जोशी ने अपनी सधी हुई, मनोहारी प्रस्तुति से पूरे सभागार का वातावरण दिव्यता से भर दिया। सितार की स्वरलहरियों ने न केवल उपस्थित दर्शकों को भारतीय शास्त्रीय परंपरा की गहराइयों से जोड़ा, बल्कि दिन की शुरुआत को सांस्कृतिक गरिमा प्रदान की। उनके साथ तबला वादन कर रहे मनोज पाटीदार की लयकारी और ताल-संरचना ने प्रस्तुतिकरण को और भी ऊँचाई प्रदान की। इस सांगीतिक आरंभ ने विश्वरंग के अंतिम दिन को उत्साह, ऊर्जा और ज्ञानवर्धक संवादों के प्रति उत्सुकता से भर दिया।
संगीत की मधुर शुरुआत के बाद पहले वैचारिक सत्र में इंडिया टुडे और लल्लनटॉप के संपादक सौरभ द्विवेदी ने ‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ और ‘तत्वमसि’ जैसे वेदांत सूत्रों के माध्यम से सीखने और आत्मविकास की अवधारणा पर विस्तृत चर्चा की। उन्होंने यह प्रश्न उठाया कि क्या मनुष्य केवल अपने परिवेश का उत्पाद रह जाता है या वह स्वयं को लगातार नए रूप में गढ़ सकता है। उनका कहना था कि सीखना रुकते ही मनुष्य ठहर जाता है, और मन का विस्तार तभी संभव है जब वह शंका, जिज्ञासा और अनुभव से संचालित हो। उन्होंने विद्यार्थियों को सुनने की कला विकसित करने, विविध विचारों के संपर्क में रहने और वैज्ञानिक चेतना को महत्व देने की प्रेरणा दी। उनके वक्तव्य में डिंडोरी के बंधक बनाए गए व्यक्ति की घटना जैसे मार्मिक प्रसंग भी शामिल थे, जो समाज की कठोर वास्तविकताओं को रेखांकित करते हैं।


दोपहर के सत्र में प्रसिद्ध अभिनेत्री सान्या मल्होत्रा के साथ संवाद छात्रों और युवा कला-प्रेमियों का विशेष आकर्षण रहा। प्रो–चांसलर डॉ. अदिति चतुर्वेदी वत्स और विकास अवस्थी से बातचीत में सान्या ने अभिनय को ‘सतत साधना’ बताते हुए कहा कि किसी भी पात्र को जीवंत बनाने के लिए उसकी भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक संरचना को समझना आवश्यक है। उन्होंने बताया कि पटकथा को बार-बार लिखने, पात्र से जुड़ी जगहों का अवलोकन करने और निरंतर अभ्यास से ही कलाकार अपनी संवेदनशीलता को विकसित करता है। उन्होंने राष्ट्रीय पुरस्कारों से जुड़े अनुभव साझा करते हुए कहा कि अस्वीकृति और संघर्ष कलाकार को मज़बूत बनाते हैं और शिक्षा व्यक्ति में वह दृष्टि विकसित करती है, जो अभिनय को गहराई देती है।
इसके बाद पौराणिक आख्यानों पर विद्वान और प्रसिद्ध लेखक देवदत्त पटनायक ने ‘मायथोलॉजी’ शब्द के वास्तविक अर्थ, ‘मिथ्या’ की अवधारणा और ज्ञान-विज्ञान में जिज्ञासा की भूमिका पर गहन विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि आख्यान दुनिया को समझने का एक माध्यम हैं, और शंका ज्ञान का द्वार खोलती है, न कि अंधश्रद्धा। उन्होंने शास्त्रार्थ की मूल भावना—ज्ञान के अन्वेषण—पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बहस की गर्मी में सरस्वती विदा हो जाती हैं।
समानांतर सत्रों में भी गंभीर और महत्त्वपूर्ण चर्चाएँ हुईं। अंजनी सभागार में ‘मीडिया में छवियों का महसंजाल और बदलती सामाजिक दृष्टि’ विषय पर सत्र में सुमित अवस्थी ने डिजिटल युग में पत्रकारिता की चुनौतियों, सोशल मीडिया की तेज़ रफ्तार, फेक न्यूज़ और उपभोक्ता की जिम्मेदारी पर सारगर्भित विचार रखे। आदिरंग सभागार में ‘लुप्तप्राय भाषाएँ’ विषयक सत्र में डॉ. स्नेहलता नेगी ने भाषा को सामुदायिक स्मृति बताते हुए बताया कि भाषा का लोप किसी संस्कृति की असंख्य परंपराओं के समाप्त होने के समान है।
इसी बीच टैगोर बाल कला कार्यशाला में बच्चों की रचनात्मकता रंगों, आकृतियों और कल्पनाओं में खिलती दिखाई दी। क्ले मॉडलिंग, पेंटिंग और प्रिंट मेकिंग की गतिविधियों ने बच्चों में कला के प्रति संवेदनशीलता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रोत्साहित किया।
‘भाषा प्रौद्योगिकी और भारतीय भाषाएँ’ पर हुए सत्र में अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने डिजिटल भविष्य में भारतीय भाषाओं की संभावनाओं और चुनौतियों का आकलन किया। वहीं ‘लेखक से मिलिए’ सत्र में डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी ने व्यंग्य, सत्ता, समाज और लेखन की साधना पर विचार रखे। अन्य सत्रों में कथेतर साहित्य, स्त्री अस्मिता और भारतीय विचारिकी जैसे विषयों पर सारगर्भित विमर्श हुए।

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