सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल श्री मनोज सिन्हा ने प्रसिद्ध लेखक और संसद सदस्य स्वर्गीय श्री शंकर दयाल सिंह को “संत लेखक” के रूप में वर्णित किया और सत्य के प्रति उनके पूर्ण समर्पण की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि शंकर दयाल सिंह ने अपने लेखन में कभी भी सत्य के मार्ग में संबंधों को बाधा नहीं बनने दिया। सत्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता अडिग थी, और उनके शब्दों और कार्यों ने भारतीय राजनीति और समाज पर एक अमिट छाप छोड़ी।
शंकर दयाल सिंह ने 1971 से 1977 तक संसद सदस्य के रूप में कार्य किया और इस दौरान उन्होंने भारत में आपातकाल का दौर देखा। उनकी पुस्तक “इमरजेंसी: क्या सच, क्या झूठ” उस समय की राजनीतिक घटनाओं और उनके व्यक्तिगत अनुभवों का प्रतिबिंब है। इस पुस्तक की प्रस्तावना में सिंह ने अपनी अंतरात्मा की आवाज व्यक्त करते हुए लिखा, “मेरी साफगोई कुछ विवाद खड़े कर सकती है, और मेरे मित्रों को भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन मैं क्या करूं? मेरे राजनीतिक आत्मा की त्वचा के नीचे छिपा सत्य का दर्द मुझे लगातार कचोटता है।” सत्य बोलने का यह साहस केवल एक संत लेखक ही कर सकता है, जैसा कि मुख्य अतिथि श्री मनोज सिन्हा जी ने अपने विचारों में कहा।
कार्यक्रम के दौरान, परमार्थ निकेतन, हरिद्वार के स्वामी चिदानंद सरस्वती ने शंकर दयाल सिंह से जुड़े अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि उनकी मुलाकात सिंह से प्रसिद्ध न्यायविद डॉ. लक्ष्मीलाल सिंघवी के माध्यम से हुई थी, जब डॉ. सिंघवी यूनाइटेड किंगडम में भारत के राजदूत थे। डॉ. सिंघवी के प्रोत्साहन से “हिंदू वर्ल्ड एंसाइक्लोपीडिया” पर काम शुरू हुआ, और शंकर दयाल सिंह इस परियोजना के लिए गठित टीम का अभिन्न हिस्सा थे। स्वामी जी ने कहा कि इस विश्वकोश में सिंह का रचनात्मक योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण था। सिंह के अचानक निधन को याद करते हुए स्वामी जी ने कहा कि, “जैसे एक यात्री अपनी अंतिम यात्रा पर निकलता है, वैसे ही सिंह ने दिव्य इच्छा से प्रेरित होकर यह यात्रा शुरू की।”

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