सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : फिलहाल जब मैं डिजिटल समय में साहित्य और कलाओं की स्थिति पर विचार कर रहा हूँ तो बरबस ही चालीस के दशक में वॉल्टर बेंजामिन द्वारा लिखित लंबे आलेख `आर्ट इन द इरा ऑफ मैकेनिकल रिप्रॉडक्शन’, (यांत्रिक पुनर्उत्पादन के समय में कलाऐं) की याद आ गई है. प्रिंटिंग प्रेस तब तक व्यापक रूप से प्रचलन में आ गई थी जिसने पेंटिंग्स का बड़े पैमाने पर मुद्रण संभव बना दिया था. जिस कला का आस्वाद पहले संग्रहालयों में या चित्रकार के निवास पर जाकर घंटों उसे निहारते हुये किया जाता था, अब वह प्रिंटेड स्वरूप मॆं आस्वादक के घर तक पहुंच गई थी और शायद उसके ड्राइंग रूम की शोभा बढ़ा रही थी. वह उसे कभी भी देख सकता था, उसके आस्वाद का समय और तरीका अब निश्चित नहीं रहा था. बेंजामिन का मानना था कि इससे कलात्मक आस्वाद की जनतांत्रिकता तो बढ़ी थी लेकिन उसकी गुणवत्ता का ह्रास हुआ था.
आगे चलकर यही संगीत के साथ हुआ. ऑडियो टेक्नॉलॉजी के आने के बाद संगीत के आस्वाद का तरीका बदल गया. भारतीय शास्त्रीय संगीत के संदर्भ में कहा जाये तो लंबी-लंबी बैठकों का प्रचलन धीरे-धीरे समाप्त हो गया. रिकॉर्ड्स जब तक डिस्क पर थे तब तक भी वे उच्च वर्ग की ही पहुंच में आते थे. पर फिर उनके कैसेट्स पर और वहाँ से सी.डी. पर और फिर वहाँ से पेन ड्राइव पर और उससे भी आगे बढ़कर अब क्लाउड पर आने के बाद संगीत की उपलब्धता सर्वसुलभ हो गई है. आप घर पर कमरे में अंधेरा करने के बाद आराम से पैर फैलाकर, अपनी पसंद का संगीत सुन सकते हैं. कलाकार को सामने रहने की कोई ज़रूरत नहीं. समाज के लगभग सभी तबकों की अभिरुचियों के लिये संगीत आपको डिजिटल स्वरूप में मिल जायेगा. आपको बस चुनना भर है. पर फिर भी क्या आप संगीत का वैसा ही मजा ले पाते हैं जैसा रातभर चलने वाली किसी बैठक से आपको मिलता था?
विडियो टेक्नॉलॉजी के अत्यधिक विस्तार और सर्वसुलभता के कारण लिखे हुये शब्द की प्रभावशीलता और आस्वाद पर भी प्रभाव पड़ा है. पहले के तरह की चित्रात्मकता और दृश्यमयता अब कविताओं में देखने नहीं मिलती और अगर मिलती भी है, तो वैसा प्रभाव नहीं डालती. कहानियों और उपन्यासों की गति में परिवर्तन हुआ है, वहाँ घटनाऐं अब तेजी से घटित होती हैं और फोटोग्राफिक चमक के साथ आपके सामने से गुज़रती हैं. कैमरा किसी स्थान या घटना पर पैन होता है और पूरी डिटेलिंग के साथ आपको उस स्थान या घटना का विवरण देता है. कई छोटी-छोटी चीज़ें आपको बड़ी या विस्तारित नज़र आती हैं और कई बड़ी चीज़ें या घटनाऐं अचानक तुच्छ लगने लगती हैं.
डिजिटल टेक्नॉलॉजी ने ऑडियो, विडियो और टेक्स्ट को अभिसरित कराया, उसने प्रोसेसिंग और संप्रेषण की गतियाँ बदलीं, हमारे मानसिक ढांचे पर धीरे-धीरे प्रभाव डाला. उसे टुकड़ों-टुकड़ों में सोचने और आस्वाद लेने के लिये तैयार किया और इस तरह, आस्वाद के धरातल को ही पूरी तरह बदल दिया. कलात्मक स्तर पर क्या इस प्रक्रिया के कुछ प्रभाव पहचाने जा सकते हैं और वे मनुष्य के आंतरिक विश्व को प्रकाशित करने और उसका विस्तार करने में सक्षम हैं? आइये, देखते हैं.
डिजिटल टेक्नॉलॉजी, जिसमें ऑडियो और विडियो टेक्नॉलॉजी शामिल हैं, का कलाओं पर पहला प्रभाव ये पड़ा है कि उनमें एक सतही फोटोग्राफिक चमक पैदा हुई है लेकिन उनमें से गहराई का लोप होता जा रहा है. दूसरे शब्दों में गति और चमक तो है पर गहराई, जो गहरे मानवीय गुणों जैसे करुणा, दया या सहानुभूति से प्राप्त होती थी, गायब है. हम दृश्य देखते हैं पर दिल में कोई हरकत नहीं होती. एक सपाट बियाबान की तरह रचना निकल जाती है जिसमें कहीं भी करुणा या किसी उच्चतर मानवीय गुण का सोता बहता नहीं दिखाई पड़ता. इसका दूसरा प्रभाव यह पड़ा है कि रचना या नरेटिव जिसमें पेंटिंग तथा संगीत के नरेटिव भी शामिल हैं, की गति बढ़ गयी है. कलाऐं जो एक शीतल छांव की तरह हुआ करती थीं जहाँ ठहर कर थोड़ा विश्राम किया जा सकता था, अब एक अनवरत गति में बदल गयी हैं जो या तो मनुष्य के मानस से मेल नहीं खातीं या उसे अवांछित रूप से बदले दे रही हैं. गति का ही एक और पक्ष है तापक्रम. क्योंकि सामान्य और सहज तापक्रम पर रहते हुये वह गतिशीलता प्राप्त नहीं की जा सकती, तो रचनाऐं एक ऊंचे लेकिन कृत्रिम तापक्रम पर जाकर लिखी जा रही हैं, जहाँ मनुष्य अपने आपको भागते हुये भाप के कमरे में पाता है. वहाँ उसे आश्रय तो क्या मिलेगा?
तो क्या ये सब मनुष्य के लिये उचित है? हम सब ये बात अनुभव से और अवलोकन से भी जानते हैं कि प्रत्येक जीवित वस्तु (अस्तित्व) त्रिआयामी होती है. लंबाई चौड़ाई के अलावा उसमें एक गहराई भी होती है, जो उसके आंतरिक विश्व का निर्धारण करती है. जबकि जड़ पदार्थ अधिकतर एक आयामी या द्विआयामी होता है. कितना भी प्रयास करें, बिंदु बिंदु ही रहेगा या रेखा एक आयामी रेखा ही रहेगी. सतह का निर्माण रेखाओं के माध्यम से हो सकता है पर उसमें कोई गहराई, कोई भीतरी पक्ष, कोई आंतरिक तल नहीं होगा. वह समतल ही रहेगी. यदि हमें जड़ पदार्थ, या बाहरी दिखने वाले विश्व के विवरण से आगे बढ़कर जीवित वस्तुओं के बारे में लिखना है या कलात्मक निर्माण करना है तो हमें तीसरे आयाम का प्रवेश कराना ही होगा, जो उसमें गहराई लाने से संभव होगा. मानवीय संदर्भ में ये गहराई मानवीय गुणों से आती है जिनका जिक्र मैंने ऊपर किया है.
डिजिटल समय में साहित्य और कलाओं की बहस को सिर्फ टेक्नॉलॉजी के संदर्भों से आगे बढ़कर, प्रभावशीलता और आस्वाद के धरातल तथा मानवीय गुणों के विकास तक आना होगा, जो साहित्य तथा कलाओं का मूल काम था. उपरोक्त आधारों पर इस समय की कला आलोचना भी विकसित की जा सकती है.
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