जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सौ वर्षों की यात्रा पर दृष्टि डालते हैं, तो यह केवल एक संगठन की कहानी नहीं रह जाती — यह भारत की आत्मा, संस्कृति और समाज के पुनर्जागरण की गाथा बन जाती है। नागपुर के एक छोटे से मैदान से प्रारंभ हुई यह शाखा आज विश्व के साठ देशों में कार्यरत, एक विराट विचार-संघटन बन चुकी है।
संघ का प्रारंभ और विचार-बीज
27 सितंबर 1925 को विजयादशमी के दिन डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में पांच बालकों के साथ एक शाखा प्रारंभ की। उस समय किसी ने नहीं सोचा था कि यह छोटी-सी शुरुआत एक दिन विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन का रूप ले लेगी। डॉ. हेडगेवार ने कहा था— “हिंदू समाज को संगठित करना होगा, उनमें आत्मबल और एकता का संचार करना होगा; यह कार्य पीढ़ियों का है, पर हमें आज से ही शुरू करना होगा।”
धीरे-धीरे शाखाएं बढ़ीं, भगवा ध्वज संघ का प्रतीक बना और शाखा व्यवस्था ने संगठनात्मक अनुशासन को स्वरूप दिया।
संघ के युगपुरुष और विस्तार
डॉ. हेडगेवार के बाद माधव सदाशिव गोलवलकर ‘गुरुजी’ ने संघ को वैचारिक आधार दिया। उनकी पुस्तकें “We or Our Nationhood Defined” और “Bunch of Thoughts” संघ की विचार-दिशा बनीं।
भाऊसाहब देवरस, राजेंद्र सिंह ‘राज्जू भैया’, के.एस. सुदर्शन और वर्तमान सरसंघचालक श्री मोहन भागवत ने इस यात्रा को आगे बढ़ाया। आज लगभग 70,000 शाखाओं के माध्यम से यह संगठन जन-जन तक पहुँच चुका है।
स्वतंत्रता से राष्ट्रनिर्माण तक
संघ ने भले स्वतंत्रता संग्राम में संगठनात्मक भागीदारी न की हो, पर उसके स्वयंसेवक 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से लेकर विभाजन के समय राहत कार्यों तक में अग्रणी रहे। गांधीजी की हत्या के बाद 1948 में लगा प्रतिबंध संघ के अनुशासन और आत्मबल से शीघ्र हट गया। इसके बाद डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जनसंघ की स्थापना की, जो आगे चलकर भाजपा के रूप में प्रकट हुआ।
आपातकाल के दौरान संघ के प्रचारकों ने संघर्ष और लोकतंत्र रक्षा का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया।
सेवा, शिक्षा और संगठन की त्रिवेणी
संघ का कार्यक्षेत्र केवल शाखाओं तक सीमित नहीं रहा। विद्या भारती, सेवा भारती, वनवासी कल्याण आश्रम, भारतीय मजदूर संघ, विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठन इसके सामाजिक और सांस्कृतिक विस्तार का प्रतीक हैं।
विद्या भारती आज देश के 668 जिलों में 21,000 से अधिक विद्यालयों और 9,000 से अधिक संस्कार केंद्रों के माध्यम से तीन करोड़ से अधिक छात्रों तक संस्कारयुक्त शिक्षा पहुँचा रही है। सेवा भारती और वनवासी कल्याण आश्रम स्वास्थ्य, शिक्षा और जनसेवा में अग्रणी हैं।
संगठन का ढांचा और कार्यपद्धति
संघ का संचालन शाखा प्रणाली, प्रशिक्षण वर्गों और प्रचारक व्यवस्था पर आधारित है। यह एक पिरामिडीय ढांचे में नगर से अखिल भारतीय स्तर तक फैला हुआ है, जिसका निर्णय-तंत्र सामूहिक सहमति पर चलता है। अनुशासन, सेवा भाव और राष्ट्रभक्ति इसकी आत्मा हैं।
आज का संघ: आत्मनिर्भर और समरस भारत की ओर
सौ वर्षों में संघ ने न केवल सामाजिक समरसता, बल्कि पर्यावरण, परिवार, संस्कृति और आत्मनिर्भरता को भी अपने अभियानों का हिस्सा बनाया है। कोविड महामारी से लेकर प्राकृतिक आपदाओं तक, स्वयंसेवक हर मोर्चे पर सेवा में रहे हैं।
2025 में संघ का शताब्दी वर्ष सामाजिक सद्भाव, पर्यावरण संरक्षण, आत्मनिर्भरता और पारिवारिक मूल्यों पर केंद्रित अभियानों के साथ प्रारंभ हुआ — जो भारत के विकसित भारत बनने की दिशा में एक मील का पत्थर सिद्ध हो रहा है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की यह यात्रा यह बताती है कि संगठन यदि विचार और सेवा पर आधारित हो, तो वह एक युग का निर्माण कर सकता है। नागपुर की उस छोटी शाखा से निकली लौ आज समूचे राष्ट्र को आलोकित कर रही है।
(लेखक – प्रो. सी.सी. त्रिपाठी, निदेशक, एनआईटीटीटीआर, भोपाल)

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