सीएनएन सेंट्रलन्यूज़ एंड नेटवर्क – आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस / आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : आज जब मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड को देश की सबसे बड़ी टैक्स भरने वाली कंपनी कहा जाता है, तो ये जानकर हैरानी होती है कि यही कंपनी कभी तीन दशक तक जीरो टैक्स पर ऑपरेट करती रही थी। साल 1966 से लेकर 1996 तक, रिलायंस ने कॉरपोरेट इनकम टैक्स नहीं चुकाया था।
दरअसल, कंपनी ने सरकार की उन नीतियों और टैक्स इंसेंटिव्स का लाभ उठाया जो प्रोडक्टिव एसेट्स में निवेश को बढ़ावा देती थीं। इस वजह से रिलायंस तकनीकी रूप से किसी भी नियम का उल्लंघन किए बिना टैक्स देनदारी से बची रही। उस समय न तो सरकार ने आपत्ति जताई और न ही कंपनी ने कोई गड़बड़ी की।
1996-97 के बाद परिस्थितियां बदलीं। बजट 1997-98 में टैक्स दरें घटाकर 35% कर दी गईं, जिसे ज्यादा व्यावहारिक माना गया। इसके साथ ही धीरूभाई अंबानी ने रिलायंस की वैश्विक साख बढ़ाने की योजना बनाई। इंटरनेशनल निवेशकों के बीच पारदर्शिता और विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए कंपनी ने टैक्स देना शुरू किया।
इसी दौरान इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने न्यूनतम वैकल्पिक कर लागू किया ताकि वे कंपनियां जो मुनाफा कमा रही थीं और डिविडेंड भी दे रही थीं, वे टैक्स के दायरे में आ सकें।
आज रिलायंस ने एक लंबा सफर तय करते हुए FY2023-24 में ₹25,707 करोड़ का टैक्स भरकर सबसे ऊपर जगह बनाई है — एक ज़माने की टैक्स-फ्री कंपनी अब टैक्स के मामले में मिसाल बन गई है।
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