सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल: आज हम चर्चा करेंगे महाराष्ट्र की राजनीति में मुसलमानों की घटती राजनीतिक भागीदारी और इसके पीछे के कारणों पर। शीर्षक है: “फिर मुसलमानों के सवाल कौन उठाएगा?”

मुसलमानों का असमान प्रतिनिधित्व

महाराष्ट्र में मुसलमानों की आबादी लगभग 12% है, जो राज्य की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता का अहम हिस्सा है। लेकिन राज्य की 288 सीटों वाली विधानसभा में उनका प्रतिनिधित्व मात्र 3% है। ये आंकड़े इस बात की ओर इशारा करते हैं कि इतनी बड़ी आबादी की आवाज़ राजनीतिक मंचों पर क्यों दब जाती है। सवाल उठता है: क्या इस समुदाय की समस्याएं सही मंच तक पहुंच पाती हैं?

राजनीतिक दलों की स्थिति

राजनीतिक दलों की बात करें तो तस्वीर और भी गंभीर हो जाती है।

  • बीजेपी और शिवसेना: बीजेपी और एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने 2024 के चुनाव में एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया। इनके हिंदुत्व-आधारित कैंपेन में मुस्लिम समुदाय की भागीदारी कम ही दिखाई देती है।
  • कांग्रेस: कांग्रेस ने केवल 9 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे, जो कुल सीटों की तुलना में बहुत कम है।
  • एआईएमआईएम: दूसरी ओर, आक्रांत मुस्लिम इंपीरियल मोर्चा (एआईएमआईएम) ने 16 उम्मीदवार उतारे, लेकिन उनकी पहुंच अभी भी सीमित है।

क्या मुस्लिम समुदाय की राजनीतिक स्थिति बदलने की जिम्मेदारी कोई पार्टी उठाएगी? यह सवाल अभी भी खुला है।

मुसलमानों की समस्याएं और चुनौतियां

मुसलमान समुदाय की सबसे बड़ी समस्याएं हैं:

  • शिक्षा: शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ेपन का सामना करना पड़ रहा है, जिससे युवाओं के लिए बेहतर अवसरों की कमी है।
  • रोजगार: बेरोजगारी दर अधिक है, जिससे आर्थिक स्थिरता नहीं आ पाती।
  • सामाजिक सुरक्षा: सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का पर्याप्त लाभ नहीं मिल पा रहा है, जिससे जीवन स्तर में सुधार नहीं हो पा रहा है।

इसके अलावा, बढ़ती सांप्रदायिक घटनाएं भी इस समुदाय के जीवन को और चुनौतीपूर्ण बना रही हैं। आर्थिक रूप से पिछड़े इस समुदाय को सरकारी योजनाओं का पर्याप्त लाभ नहीं मिल पाता, जिससे उनकी स्थिति में सुधार नहीं हो पा रहा है।

क्या राजनीति में बदलाव की लहर है?

उद्धव ठाकरे की भूमिका: उद्धव ठाकरे ने खुद को एक धर्मनिरपेक्ष नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश की है। उनकी इस छवि ने उन्हें मुस्लिम समुदाय में काफी लोकप्रिय बना दिया है। महा विकास अघाड़ी (एमवीए) के कार्यकाल में किए गए विकास कार्यों और मुस्लिम समुदाय के लिए अपनाई गई नीतियों का असर साफ देखा जा सकता है। उद्धव ठाकरे की यह पहल उनके नेतृत्व में महाराष्ट्र की राजनीति को एक नया दिशा देने में सफल साबित हो रही है।

शिंदे सरकार का नया गेम प्लान: लोकसभा चुनावों में महायुति को मिली हार के बाद, एकनाथ शिंदे की शिवसेना अब मुस्लिम समुदाय को अपने पक्ष में लाने की योजना बना रही है। इस रणनीति के तहत, कई नई योजनाओं और विकास परियोजनाओं को मुस्लिम बहुल इलाकों में लागू करने पर विचार किया जा रहा है। शिंदे सरकार ने घोषणा की है कि वे शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में विशेष ध्यान देंगे, ताकि मुस्लिम समुदाय को विशेष लाभ मिल सके।

विशेषज्ञों की राय

राजनीतिक विश्लेषक का कहना है: “मुसलमानों का कम प्रतिनिधित्व राजनीतिक दलों की प्राथमिकता को दिखाता है। अगर दलों को उनका समर्थन चाहिए, तो उन्हें जमीन पर काम करना होगा।”

समुदाय के नेता का कहना है: “हमारे मुद्दे सिर्फ वोट बैंक तक सीमित नहीं होने चाहिए। हमें स्थायी समाधान चाहिए।”

निष्कर्ष: क्या मुसलमानों की आवाज़ सुनी जाएगी?

तो सवाल अब भी कायम है – क्या मुसलमानों की आवाज़ सुनी जाएगी? क्या उनके सवालों को उठाने के लिए कोई राजनीतिक दल ईमानदारी से आगे आएगा?