पश्चिम बंगाल की राजनीति का परिदृश्य अब केवल विकास और धर्मनिरपेक्षता की भाषा तक सीमित नहीं रहा। बीते कुछ वर्षों में भाजपा द्वारा ‘जय माँ काली’ जैसे सांस्कृतिक और धार्मिक नारों को आक्रामक रूप से चुनावी मैदान में उतारा गया है। इसके जवाब में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अब खुद उसी धार्मिक मंच पर उतरने का फैसला किया है, जो पहले उनकी राजनीति का हिस्सा नहीं माना जाता था।
ममता बनर्जी अब देवी काली के मंदिरों में जाती हैं, पूजा करती हैं और स्वयं को बंगाल की सांस्कृतिक पहचान से गहराई से जोड़ती हैं। यह बदलाव केवल चुनावी ज़रूरत नहीं, बल्कि एक गहरी रणनीतिक पुनर्रचना है—जिसमें तृणमूल कांग्रेस ने यह समझा है कि धार्मिक प्रतीकों की अनदेखी करने से मैदान भाजपा के लिए खाली हो जाता है। ऐसे में भाजपा के सांस्कृतिक प्रभाव को मात देने के लिए अब तृणमूल भी काली पूजा और मंदिर दर्शन को राजनीतिक संवाद में शामिल कर रही है।
बंगाल में देवी काली केवल धार्मिक प्रतीक नहीं हैं, बल्कि जनमानस की सांस्कृतिक आत्मा हैं। यही कारण है कि भाजपा ने उन्हें एक राजनीतिक प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया और ममता बनर्जी ने उसे चुनौती देने का निर्णय लिया। उन्होंने यह कहते हुए कि “काली मेरी रगों में हैं,” भाजपा के सांस्कृतिक दावे को सीधा जवाब दिया है। यह केवल आस्था की बात नहीं, बल्कि बंगाली अस्मिता के ऊपर स्वामित्व के दावे की लड़ाई है।
तृणमूल कांग्रेस अब दोहरी रणनीति पर चलती दिख रही है—एक ओर मंदिरों और देवी आराधना से बहुसंख्यकों को संदेश, दूसरी ओर अल्पसंख्यकों के बीच सामाजिक समरसता का संदेश कायम रखने का प्रयास। यह संतुलन साधना आसान नहीं है, क्योंकि दोनों वर्गों की अपेक्षाएं और संवेदनशीलताएं अलग हैं। फिर भी ममता बनर्जी का यह प्रयास इस बात का संकेत है कि आज की राजनीति में धार्मिक प्रतीकों की उपेक्षा करना अब व्यावहारिक नहीं रह गया है।
बंगाल में चुनावी मुकाबला अब केवल योजनाओं, घोषणाओं और नारों पर नहीं टिका है। यह एक सांस्कृतिक और भावनात्मक संग्राम बन चुका है, जिसमें देवी-देवताओं की छवियाँ, नारों की शक्ति और मंदिरों की गूंज भी निर्णायक भूमिका निभा रही है। ममता बनर्जी की यह मंदिर राजनीति भाजपा के धार्मिक वर्चस्व के सामने एक स्थानीय सांस्कृतिक प्रतिपक्ष प्रस्तुत करती है—जहाँ धर्म केवल चुनावी हथियार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्मिता का सवाल है। अब यह जनता पर निर्भर है कि वह इस सांस्कृतिक संतुलन को स्वीकार करती है या इसे चुनावी गणित मानकर खारिज करती है। लेकिन इतना तय है कि मंदिर अब बंगाल की राजनीति में केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि विचार और प्रभाव का नया मंच बन चुके हैं।

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