2014 में शुरू हुआ “मेक इन इंडिया” अभियान भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाने, विदेशी निवेश आकर्षित करने और रोजगार सृजन का वादा लेकर आया था। एक दशक बाद, इसकी तस्वीर मिश्रित है—कुछ क्षेत्रों में शानदार प्रगति, तो कई मोर्चों पर अधूरे वादे।
उपलब्धियाँ:
मोबाइल फोन निर्माण: भारत ने मोबाइल फोन निर्माण में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। Apple जैसी कंपनियाँ तमिलनाडु और कर्नाटक में iPhone का उत्पादन कर रही हैं। 2020 में 10 अरब डॉलर से बढ़कर 2024-25 तक मोबाइल निर्यात 15 अरब डॉलर को पार कर जाएगा।
PLI योजना और रोजगार सृजन: उत्पादन प्रेरित प्रोत्साहन (PLI) योजना ने 10 लाख करोड़ रुपये का निवेश आकर्षित किया है और 6 लाख रोजगार सृजित किए हैं। यह योजना इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा, ऑटोमोबाइल और ड्रोन क्षेत्रों को गति दे रही है।
ऑटोमोबाइल क्षेत्र में सफलता: भारत अब दुनिया का चौथा सबसे बड़ा वाहन बाजार बन चुका है, जो मेक इन इंडिया के तहत एक प्रमुख सफलता है।
रक्षा क्षेत्र: 2025 तक रक्षा उपकरणों की 70% खरीद भारत के घरेलू स्रोतों से करने का लक्ष्य है, जो सकारात्मक दिशा में बढ़ रहा है।
चुनौतियाँ:
विनिर्माण का GDP में योगदान: हालांकि कई क्षेत्रों में प्रगति हुई है, फिर भी विनिर्माण क्षेत्र का GDP में योगदान 16-17% पर अटका हुआ है, जबकि चीन (27%) और वियतनाम (25%) कहीं आगे हैं।
उच्च तकनीक क्षेत्रों में प्रगति: सेमीकंडक्टर जैसे उच्च तकनीक क्षेत्रों में प्रगति सीमित रही है। वेदांता-Foxconn जैसे प्रमुख प्रोजेक्ट्स तकनीकी और वित्तीय बाधाओं से जूझ रहे हैं, जिससे इन क्षेत्रों में अपेक्षित गति नहीं मिल पा रही है।
लॉजिस्टिक्स लागत: भारत में लॉजिस्टिक्स की लागत GDP का 13-14% है, जो विकसित देशों (8-9%) से अधिक है। PM गति शक्ति और नेशनल लॉजिस्टिक्स नीति के बावजूद, लागत को 8% तक कम करने का लक्ष्य चुनौतीपूर्ण है।
श्रम सुधारों की स्थिति: श्रम सुधार (चार नए श्रम कोड) पारित किए गए हैं, लेकिन कई राज्यों में इनका सही तरीके से पालन नहीं हो रहा है, जिससे इनका जमीनी असर सीमित है। इसके अलावा, Ease of Doing Business में भारत 2020 में 63वें स्थान पर था, और छोटे उद्यमों को नौकरशाही और प्रक्रियागत अड़चनों का सामना करना पड़ता है।
वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में कमजोर एकीकरण: भारत का वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में एकीकरण अभी भी कमजोर है। उदाहरण के लिए, वियतनाम इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में भारत से कहीं आगे है, जिसका निर्यात लगभग 50 अरब डॉलर है।
आगे की राह:
आधारभूत ढाँचे और स्किल डेवलपमेंट: मेक इन इंडिया को केवल प्रोत्साहन योजनाओं से आगे बढ़कर आधारभूत ढाँचे, स्किल डेवलपमेंट और नवाचार पर ध्यान देना होगा। इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन और ग्रीन हाइड्रोजन मिशन जैसे प्रयासों में सरकारी-निजी भागीदारी बढ़ानी होगी।
नेशनल स्किल डेवलपमेंट मिशन: इस मिशन के तहत 4 करोड़ युवाओं को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य बहुत महत्वपूर्ण है। इससे कार्यबल की गुणवत्ता में सुधार होगा और नए क्षेत्रों में काम करने के अवसर बढ़ेंगे।
सरल श्रम, भूमि और पूंजी तक पहुँच: श्रम, भूमि और पूंजी तक पहुँच को और सरल करना होगा ताकि न केवल बड़े उद्योगों, बल्कि छोटे और मझोले उद्योगों को भी सही अवसर मिल सकें।
स्टार्टअप्स और MSME को प्रोत्साहन: स्टार्टअप्स और MSME को प्रोत्साहन देने से नवाचार को गति मिलेगी और भारतीय उद्योग वैश्विक प्रतिस्पर्धा में खुद को साबित कर पाएंगे।
नवीनता और गुणवत्ता पर जोर: मेक इन इंडिया को केवल एक नारे से आगे बढ़कर एक वास्तविक आंदोलन में बदलने के लिए भारतीय उद्योगों को गुणवत्ता, प्रतिस्पर्धा और नवाचार में विश्वस्तरीय बनाना होगा। तभी भारत वैश्विक विनिर्माण में एक मजबूत स्थान हासिल करेगा।
निष्कर्ष:
मेक इन इंडिया एक बड़े उद्देश्य के साथ शुरू हुआ था, लेकिन इसे सफल बनाने के लिए आवश्यक है कि भारत निर्माण क्षेत्र में तकनीकी, बुनियादी ढाँचे, श्रम सुधार और नवाचार पर ध्यान दे। इसके साथ ही, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं से जुड़ने और प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे।
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