सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : सशक्त नेतृत्व का परिचय देते हुए, एम3एम फाउंडेशन की अध्यक्षा एवं ट्रस्टी डॉ. पायल कनोडिया ने 23 फरवरी को तमिलनाडु के कांचीपुरम और चेंगलपट्टू जिलों में इरुलर जनजातीय महिलाओं से मुलाकात की और उनके जीवन को करीब से समझते हुए सार्थक बदलाव लाने का संकल्प लिया। उन्होंने 2300 किलोमीटर की लंबी यात्रा कर दूरियों को चुनौती दी और अपनी अटूट प्रतिबद्धता का प्रदर्शन किया।
इरुलर जनजाति, एक द्रविड़ आदिवासी समुदाय है जिसे भारत सरकार द्वारा विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (पीवीटीजी) के रूप में मान्यता प्राप्त है। यह समुदाय चेन्नई के समीप शुष्क क्षेत्रों में पीढ़ियों से सांप पकड़ने की पारंपरिक कला के लिए प्रसिद्ध रहा है। हालांकि, आधुनिकीकरण और सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों ने इन परंपराओं को कमजोर कर दिया है, जिससे कई परिवार गरीबी, सीमित शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों से जूझ रहे हैं।
डॉ. कनोडिया की यह यात्रा केवल औपचारिक निरीक्षण नहीं थी, बल्कि फाउंडेशन के मार्गदर्शक सिद्धांत — “हर एक महिला को सशक्त बनाना” — के तहत इन सशक्त लेकिन संघर्षरत महिलाओं को आगे बढ़ाने का एक ठोस संकल्प थी।
गांवों की धूलभरी गलियों और साधारण घरों में आत्मीय संवाद के माध्यम से उन्होंने उनके दैनिक जीवन की वास्तविकताओं को समझा — जीवनयापन के लिए संसाधन जुटाने से लेकर कम आय में बच्चों की परवरिश तक। उनकी उपस्थिति ने एम3एम फाउंडेशन और मक्कल विलिपुनार्वु कल्वी संगम (एमवीकेएस) के बीच चल रही साझेदारी को और मजबूत किया, जिसके तहत 20 गांवों में परिवर्तनकारी कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं।
150 से अधिक इरुलर महिलाओं को जूट बैग निर्माण, आरी कढ़ाई, पर्यावरण-अनुकूल मोमबत्ती निर्माण और सिलाई जैसे उच्च मांग वाले कौशलों में प्रशिक्षण दिया गया है, जो परंपरा और बाजार की संभावनाओं का संतुलन प्रस्तुत करते हैं।
इन पहलों के साथ-साथ शाम के ट्यूशन केंद्र भी संचालित किए जा रहे हैं, जो इरुलर बच्चों को अतिरिक्त शैक्षणिक सहयोग प्रदान कर उनकी शिक्षा की कमी को दूर कर अगली पीढ़ी के भविष्य को संवार रहे हैं।
डॉ. कनोडिया ने केवल अवलोकन ही नहीं किया, बल्कि उपलब्धियों का उत्सव भी मनाया। उन्होंने आरी कढ़ाई, जूट बैग निर्माण, टोकरी बुनाई और सिलाई प्रशिक्षण में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाली 100 महिलाओं को व्यक्तिगत रूप से प्रमाणपत्र प्रदान किए। ये प्रमाणपत्र केवल प्रशिक्षण पूर्ण होने का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि स्थायी आजीविका की दिशा में एक मजबूत कदम हैं, जिससे महिलाएं अपने हस्तनिर्मित उत्पादों को स्थानीय और ऑनलाइन बाजारों में बेच सकेंगी।
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