सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : भारत में पाचन संबंधी विकार सबसे आम, लेकिन अपेक्षाकृत कम ध्यान दिए जाने वाले स्वास्थ्य मुद्दों में से एक के रूप में उभर रहे हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए कावेरी अस्पताल, वडापलानी ने कावेरी इंस्टीट्यूट ऑफ डाइजेस्टिव साइंसेज के शुभारंभ की घोषणा की है। यह एक विशेषीकृत क्लिनिकल पहल है, जिसका उद्देश्य जठरांत्र (गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल) और यकृत (लिवर) रोगों के लिए समन्वित, साक्ष्य-आधारित उपचार प्रदान करना है, साथ ही रोकथाम और जीवनशैली-केंद्रित हस्तक्षेपों पर भी विशेष ध्यान देना है।
पाचन स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं भारतीय जनसंख्या के एक बड़े हिस्से को प्रभावित करती हैं। एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार, लगभग 10 में से 7 शहरी भारतीय (करीब 70%) नियमित रूप से एसिडिटी, पेट फूलना, कब्ज या अपच जैसी पाचन समस्याओं का सामना करते हैं, लेकिन लक्षण गंभीर होने तक कई लोग चिकित्सकीय परामर्श लेने में देरी करते हैं।
अन्य अध्ययनों से यह भी पता चलता है कि 56% से अधिक भारतीय परिवारों में पाचन संबंधी एक से अधिक शिकायतें पाई जाती हैं, जो सभी आयु वर्गों में जठरांत्र संबंधी परेशानियों के व्यापक स्वरूप को दर्शाता है।
चिकित्सा विशेषज्ञ इस बढ़ते बोझ का कारण बदलती खान-पान की आदतों, अत्यधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों के अधिक सेवन, अनियमित भोजन समय, लगातार तनाव, निष्क्रिय जीवनशैली और अपर्याप्त नींद को मानते हैं। चिंताजनक रूप से, चिकित्सक युवाओं और किशोरों में भी पाचन विकारों में वृद्धि देख रहे हैं, जिनमें फंक्शनल बाउल डिसऑर्डर और इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज शामिल हैं।
कावेरी इंस्टीट्यूट ऑफ डाइजेस्टिव साइंसेज की स्थापना इन रुझानों के समाधान के लिए एक बहु-विषयक क्लिनिकल ढांचे के तहत की गई है, जिसमें मेडिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी, एडवांस्ड एंडोस्कोपी, सर्जिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी और हेपेटोलॉजी को एकीकृत किया गया है। इसके साथ ही रोकथाम आधारित देखभाल, पोषण संबंधी मार्गदर्शन और रोगी शिक्षा को भी समर्थन दिया जाएगा।
संस्थान की परिकल्पना पर बात करते हुए डॉ. पांडुरंगन बसुमणि, सीनियर कंसल्टेंट इंटरवेंशनल गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट एवं निदेशक, कावेरी इंस्टीट्यूट ऑफ डाइजेस्टिव साइंसेज ने कहा,
“पाचन विकार अब केवल अलग-थलग क्लिनिकल समस्याएं नहीं रह गए हैं, बल्कि ये व्यापक जीवनशैली और सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों को दर्शाते हैं। हमारा ध्यान एक ऐसी प्रणाली विकसित करने पर है, जो प्रारंभिक निदान, साक्ष्य-आधारित उपचार और दीर्घकालिक रोग प्रबंधन को प्राथमिकता दे। कावेरी इंस्टीट्यूट ऑफ डाइजेस्टिव साइंसेज को इस प्रकार डिज़ाइन किया गया है कि यह पाचन स्वास्थ्य के चिकित्सा और जीवनशैली—दोनों पहलुओं को संबोधित करते हुए संरचित और समन्वित देखभाल प्रदान कर सके।”
भारत में क्रॉनिक लिवर डिजीज का बोझ भी काफी अधिक है। एक हालिया अध्ययन के अनुसार, यकृत रोग रुग्णता और मृत्यु दर में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। नॉन-अल्कोहोलिक फैटी लिवर डिजीज शहरी भारतीय वयस्कों के लगभग 25–30% को प्रभावित करती है, जो अक्सर मोटापे और मेटाबॉलिक सिंड्रोम से जुड़ी होती है।
बदलते रोग स्वरूपों पर टिप्पणी करते हुए डॉ. टी. के. आनंद, सीनियर कंसल्टेंट – गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट एवं एंडोस्कोपिस्ट, कावेरी अस्पताल वडापलानी ने कहा,
“हम लगातार देख रहे हैं कि जठरांत्र संबंधी रोग कम उम्र में सामने आ रहे हैं, जिसका कारण जीवनशैली से जुड़ा तनाव और उपचार में देरी है। आज प्रभावी पाचन स्वास्थ्य देखभाल केवल लक्षणों से राहत तक सीमित नहीं हो सकती, बल्कि इसमें स्थायी जीवनशैली परिवर्तन, निवारक जांच और समय पर हस्तक्षेप पर भी ध्यान देना आवश्यक है।”
क्लिनिकल सेवाओं के अलावा, यह संस्थान संतुलित पोषण, पर्याप्त फाइबर सेवन, उचित जल सेवन, तनाव प्रबंधन और अच्छी नींद की आदतों पर केंद्रित जागरूकता पहलों के माध्यम से पाचन स्वास्थ्य को बढ़ावा देगा—ये सभी ऐसे प्रमुख कारक हैं, जो आंतों के स्वास्थ्य को सीधे प्रभावित करते हैं।
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