ईरान अभी भी मध्य पूर्व की प्रमुख सैन्य शक्तियों में गिना जाता है। उसके पास बैलिस्टिक मिसाइलों का बड़ा जखीरा, ड्रोन टेक्नोलॉजी, और क्षेत्रीय नेटवर्क मौजूद है। खासकर उसके “प्रॉक्सी नेटवर्क”—जैसे Hezbollah (लेबनान) और अन्य सहयोगी समूह—उसे अप्रत्यक्ष रूप से जवाबी कार्रवाई करने की क्षमता देते हैं।

विशेषज्ञ मानते हैं कि भले ही हालिया घटनाओं में ईरान को कुछ सैन्य या रणनीतिक नुकसान हुआ हो, लेकिन उसकी “डिटरेंस पावर” यानी जवाब देने की क्षमता अभी भी बरकरार है। ईरान की रणनीति सीधी जंग के बजाय असिमेट्रिक वॉरफेयर (अप्रत्यक्ष युद्ध) पर ज्यादा आधारित रही है—जिसमें साइबर अटैक, ड्रोन स्ट्राइक और सहयोगी संगठनों के जरिए दबाव बनाना शामिल है।

इसके अलावा, ईरान के पास स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे अहम समुद्री मार्गों को प्रभावित करने की क्षमता भी है, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति पर असर पड़ सकता है। यही कारण है कि दुनिया की बड़ी ताकतें भी ईरान को पूरी तरह कमजोर मानने की गलती नहीं करतीं।

हालांकि, यह भी सच है कि लगातार तनाव, प्रतिबंधों और संभावित हमलों से उसकी क्षमताओं पर दबाव जरूर पड़ा है। ईरान की अटैक पावर खत्म नहीं हुई है, बल्कि वह अब भी एक “साइलेंट लेकिन प्रभावी” ताकत बना हुआ है, जो सीधे नहीं तो अप्रत्यक्ष तरीकों से खेल पलटने की क्षमता रखता है।

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