आज की विश्व राजनीति में दोस्त और दुश्मन स्थायी नहीं होते, केवल हित स्थायी रहते हैं। यही कारण है कि भारत को एक बार फिर रणनीतिक संतुलन साधने की आवश्यकता है, क्योंकि चीन और अमेरिका—दोनों ही प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पाकिस्तान को ताकत देने में लगे हैं।
चीन वर्षों से पाकिस्तान का रणनीतिक भागीदार रहा है—CPEC से लेकर हथियारों और ड्रोन की आपूर्ति तक। लेकिन अब अमेरिका भी—जिसके साथ भारत ने बीते दशक में काफी निकटता बनाई है—फिर से पाकिस्तान के साथ सैन्य संबंधों को तवज्जो देने लगा है। एफ-16 विमानों का रखरखाव, सैन्य सहायता, और अफगानिस्तान-संबंधी समन्वय—इन सबके ज़रिए अमेरिका इस्लामाबाद के साथ अपनी पुरानी साझेदारी को पुनर्जीवित कर रहा है।
इस स्थिति में भारत को यह समझने की आवश्यकता है कि अब पाकिस्तान सिर्फ एक पारंपरिक चुनौती नहीं रहा। वह अब दो महाशक्तियों के समर्थन से लैस एक रणनीतिक इकाई बनता जा रहा है—जहां चीन दीर्घकालिक निवेश कर रहा है और अमेरिका तात्कालिक सामरिक हित साध रहा है।
यह परिदृश्य भारत के लिए केवल कूटनीतिक असहजता नहीं, बल्कि रक्षा और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए भी चुनौती है। भारत को अब तीन प्रमुख मोर्चों पर आत्ममंथन करना होगा:
1. रणनीतिक स्वायत्तता का पुनर्पाठ: भारत को न तो किसी खेमे में रहना चाहिए और न ही किसी गुट में समाहित होना चाहिए। आज आवश्यकता है नई तरह की बहुपक्षीय रणनीति की, जो भारत के हितों को सर्वोपरि रखे।2. आत्मनिर्भर रक्षा से वास्तविक शक्ति तक: रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता अब केवल नारा नहीं, ज़रूरत है। ड्रोन, मिसाइल रक्षा प्रणाली, साइबर युद्ध—इन सभी क्षेत्रों में भारत को नवाचार और निर्माण में तेजी लानी होगी।3. पड़ोसी पहले की नीति को पुनर्जीवित करें: भारत को अपने आस-पास के देशों के साथ रिश्तों में नई ऊर्जा भरनी होगी—चीन की ऋण कूटनीति और पाकिस्तान की नई चालों के सामने ठोस सांस्कृतिक, व्यापारिक और कनेक्टिविटी आधारित जुड़ाव ही जवाब हो सकता है।
भारत को अमेरिका के साथ अपनी साझेदारी बनाए रखनी चाहिए, लेकिन उसे पूर्ण रूप से उसपर निर्भर नहीं रहना चाहिए। जैसे अमेरिका अपने विकल्प खोलकर रखता है, भारत को भी अपनी परिपक्वता इसी संतुलन में दिखानी होगी।
विश्व के इस नए मानचित्र में जो देश सबसे अधिक संतुलित, आत्मनिर्भर और बहुपक्षीय होंगे—वही अपने हितों की रक्षा कर सकेंगे। भारत के पास वह क्षमता है—जरूरत है केवल स्पष्ट दृष्टि, ठोस निर्णय और निरंतर आत्मसमीक्षा की।
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