रांची। टोक्यो ओलंपिक में भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने कांस्य पदक हासिल कर और महिला हॉकी टीम ने सेमीफाइनल मुकाबले में जोरदार टक्कर दे कर देश में इस खेल प्रति जुनून को साबित करने का काम किया। इस शानदार प्रदर्शन के बाद भारतीय महिला टीम में शामिल झारखंड की दो खिलाड़ियों निक्की प्रधान और सलीमा टेटे को राज्य सरकार बुधवार को रांची वापस लौटने पर सम्मानित करने और 50-50 लाख रुपये का पुरस्कार सौंपने जा रही है। वहीं दो दिन पहले ही एक अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी गोपाल भेंगरा की मुफलिसी में मौत हो गयी। रांची के एक निजी अस्पताल में अंतिम सांस लेने वाले गोपाल भेंगरा के शव को भी अस्पताल प्रबंधन ने बिल भुगतान की मांग को लेकर परिजनों को देने से इनकार कर दिया, बाद में खूंटी के ही एक चिकित्सक के हस्तक्षेप के बाद परिजनों को उनका पार्थिव शरीर मिल पाया।

1978 में अर्जेटीना और पाकिस्तान के खिलाफ तथा चौथे विश्व कप में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले गोपाल भेंगरा ने आर्मी में भी अपनी सेवा दी, लेकिन सेवानिवृत्त के बाद पेंशन की राशि से परिवार चलाने में असक्षम होने पर उन्होंने किसी के सामने हाथ फैलाने की बजाय पत्थर तोड़ने का काम भी किया। इस बीच 1999 में एक पत्रिका में गोपाल भेंगरा की मजबूरी की खबर सार्वजनिक हुई, तो महान क्रिकेटर सुनील गावस्कर की संस्था से उन्हें प्रत्येक महीने पांच हजार रुपये की आर्थिक सहायता मिलनी शुरू हुई। जो अब बढ़कर 10 हजार रुपये प्रति माह हो गया था और संस्था की ओर से यह राशि अंत समय तक उन्हें मिलती रही।

गोपाल भेंगरा के मंझले पुत्र जितेंद्र भेंगरा बताते है कि उनके पिता के आर्मी से रिटायर होने के बाद पेंशन की राशि इतनी कम थी कि परिवार का गुजारा करना मुश्किल हो पा रहा था। हॉकी में उस समय पैसा नहीं था। मजबूर होकर उन्होंने चुरगी टोंगरी में पत्थर तोड़ने का काम शुरू किया और मजदूरी से परिवार का भरण पोषण करने लगे। मजदूरी के साथ खेती-बारी का काम भी खुद करते थे। इस बुरे दौर में भी वे जिंदगी से निराश नहीं हुए। एक वीर योद्धा की तरह उस दौर का सामना किया। इस बीच एक पत्रिका में उनकी यह कहानी छपने के बाद गावस्कर की संस्था की ओर से प्रत्येक महीने पांच हजार रुपये की आर्थिक सहायता मिलनी शुरू हुई, जो अब बढ़कर दस हजार रुपये प्रति माह हो गयी थी। वहीं अब आर्मी से मिलने वाले पेंशन की राशि भी बढ़कर 15 हजार रुपये हो गयी थी। वर्ष 2017 में रांची में भारत और आस्ट्रेलिया के बीच टेस्ट क्रिकेट मैच जब गावस्कर रांची आये, तो  गोपाल भेंगरा ने उनसे मुलाकात कर उनकी संस्था की ओर से मिलने वाली राशि के लिए कृतज्ञता प्रकट की।

अपने पिता के बारे में उनके पुत्र जितेंद्र घर-परिवार के बड़े-बुजुर्गां से मिली जानकारी को साझा करते हुए बताते है कि बचपन में माड़-भात खाकर बांस के स्टिक और गेंद से घंटो खेलते, लिहाजा दादा उनके पिता की हॉकी स्टिक छिपा देते। गरीबी की वजह से वे तीसरी कक्षा तक ही पढ़े। उस वक्त भी दिहाड़ी खटते थे। इस बीच साल 1963 में कद-काठी और दौड़-कूद के बूते वे फौज में भर्ती हो गयी। पहली पोस्टिंग मेरठ थी। फौन की हॉकी टीम में उन्हें शामिल कर लिया गया, उनके शॉर्ट कॉर्नर हिट की बड़े-बड़े दिग्गज भी प्रशंसा करते थे।

गोपाल भेंगरा को जानने वाले उनके प्रशंसक यह बताते है कि लंबे समय से गांव में गुमनाम जीवन जी रहे अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी ने अपने जीवन में काफी उतार-चढ़ाव देखा। 1970-80 के दौर में उनका रुतबा एक स्टार जैसा था। वे अपने समय के जाने-माने हॉकी खिलाड़ी थी। 1983-84 में उन्हें सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी के खिताब से भी नवाजा गया था। वे बंगाल टीम के भी कप्तान रहे। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी समेत कई बड़ी हस्तियों ने उनकी सराहना की थी।