सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : लोक संस्कृति के अध्येता और पद्मश्री डॉ कपिल तिवारी ने कहा कि हम औपनिवेशकों के हाँथों अपनी दृष्टि गवा चुके हैं। अपने ऋषिओं के उत्तराधिकारी भी साबित नहीं हो पा रहे हैं।औपनिवेशिकों की कृपा से हम इतिहास व्याकुल बन गए और हर चीज को इतिहास में ढूढ़ने लग गए। हमें अपने देश का ज्ञान उसकी ही भूमि और इतिहास बोध में समझना होगा। ज्ञान कभी नया नहीं होता। सदा ज्ञान की नई अभिव्यक्ति होती है। ज्ञान का कॉपीराइट भी नहीं होता है।
डॉ तिवारी मेपकास्ट में दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान द्वारा आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय शोधार्थी समागम-2026 में अंतिम दिन समारोप सत्र को सम्बोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि हमने समय के लेख को इतिहास नहीं माना है। इतिहास लेखन पश्चिम की देन है। वर्तमान में अकादमिक जगत में पश्चिम की मैथडोलॉजी पर आधारित रिसर्च हो रहे हैं, यह मैथडोलॉजी किसी काम की नहीं है। हमारे यहाँ ज्ञान ने ये सिखाया कि जीवन कैसे जिए और जीवन का विसर्जन कैसे करें। जगत में शाश्वत जैसा कुछ भी नहीं होता।
क्राउड फन्डिंग से भी जुटाए फंड: स्वामी नरसिम्हानन्द
इस अवसर पर कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि रामकृष्ण मिशन, कोझिकोड के स्वामी नरसिम्हानन्द के कहा कि शोध करते समय विनम्र रहें, तकनीक का उचित प्रयोग करें। शोध को तपस्या के रूप में देखें। एपीआई स्कोर के अर्जन के रूप में न देखें। बिना श्रद्धा के कोई महत्वपूर्ण कार्य नहीं हो सकता। परिश्रम करना होगा, यथेष्ठ परिश्रम करें। आज के डिजिटल युग में क्राउड फन्डिंग के माध्यम से भी शोध के लिए फंड जुटाया जा सकता है। हम अपना शोध स्वयं बनाएंगे। हम अपना मंच स्वयं बनाएंगे।
शोध का उद्देश्य डिग्री नहीं, ज्ञान होना चाहिए : प्रो. आशीष श्रीवास्तव
कार्यक्रम के सातवें सत्र में वक्ता प्रो आशीष श्रीवास्तव ने भारतीय उच्च शिक्षा और शोध प्रणाली की वर्तमान स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि आज देश में शोध का बड़ा हिस्सा अपने मूल उद्देश्य से भटक गया है, जबकि शोध का वास्तविक लक्ष्य ज्ञान समाज के लिए योगदान होना चाहिए। लोकतंत्र में नागरिकों की सोच स्पष्ट नहीं होगी, तो न प्रगति संभव है और न ही उसे बनाए रखना। उन्होंने बताया कि यह चिंता केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी स्पष्ट रूप से दर्ज है।
उन्होंने शोध संस्कृति में एपीआई आधारित मूल्यांकन व्यवस्था की आलोचना करते हुए कहा कि प्रकाशन, सेमिनार और कॉन्फ्रेंस अब गुणवत्ता के बजाय औपचारिकता बन चुके हैं। भारतीय शिक्षक और शोधार्थी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आर्थिक और बौद्धिक शोषण का शिकार हो रहे हैं। प्रो. श्रीवास्तव ने कहा कि आज शोधार्थियों पर समस्याएँ थोपी जाती हैं, जिससे शोधकर्ता और विषय के बीच सार्थक जुड़ाव नहीं बन पाता। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि अनेक पीएचडी धारक अपने ही शोध विषय को स्पष्ट रूप से समझा पाने में असमर्थ पाए गए। भाषा को लेकर प्रचलित भ्रांति पर उन्होंने कहा कि विचार भाषा से बड़ा होता है। शोध मातृभाषा में सोचकर भी किया जा सकता है, बशर्ते समस्या की समझ स्पष्ट हो। उन्होंने कहा कि अंग्रेज़ी की कमजोरी के कारण कई विद्वान अपने विचार सामने नहीं रख पाते, जिससे शोध की गुणवत्ता प्रभावित होती है। उन्होंने कहा कि जब तक शोध को डिग्री, प्रमोशन और फंडिंग से ऊपर उठाकर समस्या-आधारित और समाजोपयोगी नहीं बनाया जाएगा, तब तक उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में वास्तविक सुधार संभव नहीं है।
इस सत्र में आईसीपीआर के सचिव प्रो सच्चिदानंद मिश्र कहा कि भारत का पुनरुत्थान हम सब का कर्तव्य है। जिसके लिए हम सबको मिलजुल कर कार्य करना होगा। भारत का विकास हो सके।
अत्यधिक अवकाश पर सवाल, कार्यसंस्कृति पर आत्ममंथन करें: श्री तिवारी
समारोह सत्र में कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी ने देश की शैक्षणिक और प्रशासनिक कार्यसंस्कृति में व्याप्त अत्यधिक अवकाश प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि अवकाशों की भरमार ने भारत को धीरे-धीरे अकर्मण्यता की सीमा तक पहुँचा दिया है, जिसका सीधा असर शोध, शिक्षण और संस्थागत उत्पादकता पर पड़ रहा है। उन्होंने शोधार्थियों और शिक्षकों से आग्रह किया कि वे अपने-अपने संस्थानों में इस विषय पर विमर्श प्रारंभ करें और अनावश्यक छुट्टियों में कटौती की पहल करें। श्री तिवारी ने धार्मिक और महापुरुषों की जयंती-पुण्यतिथियों पर अवकाश लेने की प्रवृत्ति पर भी प्रश्न उठाया। उनका कहना था कि कर्म का संदेश देने वाले महापुरुषों के नाम पर अवकाश लेना एक बड़ा विरोधाभास है। ऐसे दिनों में कार्य को और अधिक समर्पण के साथ किया जाना चाहिए। उन्होंने प्रधानमंत्री के निरंतर कार्यशील रहने के उदाहरण का उल्लेख करते हुए कहा कि राष्ट्रनिर्माण केवल नीतियों से नहीं, बल्कि कार्यसंस्कृति में बदलाव से संभव है।
नई दृष्टि का सृजन है शोध: डॉ. डेहरिया
सत्र को संबोधित करते हुए डॉ. खेम सिंह डेहरिया ने कहा कि तीन दिनों तक चले इस समागम में शोधार्थियों की सजग भागीदारी यह संकेत देती है कि अकादमिक चेतना अब भी सशक्त है। उन्होंने बताया कि देशभर से आए लगभग 1300 आवेदनों में से 300 शोधार्थियों का चयन गुणवत्ता के आधार पर किया गया, जो इस आयोजन की गंभीरता को दर्शाता है। डॉ. डेहरिया ने शोध को केवल नकल-जांच सॉफ्टवेयर या तकनीकी औपचारिकताओं तक सीमित करने की प्रवृत्ति पर सवाल उठाते हुए कहा कि शोध का वास्तविक मूल्य इस बात में है कि शोधार्थी ने अपने विषय में नया क्या जोड़ा। उन्होंने पुस्तकों के गहन अध्ययन, स्वतंत्र सोच और मौलिक लेखन पर ज़ोर देते हुए कहा कि शोध केवल संदर्भों का संकलन नहीं, बल्कि नई दृष्टि का सृजन होना चाहिए। समापन में उन्होंने आयोजकों और शोधार्थियों को शुभकामनाएँ देते हुए उम्मीद जताई कि यह समागम शोध की दिशा को नई ऊर्जा देगा।
भारतीय ज्ञान परंपरा अनुभव-आधारित रही, पश्चिम ने तर्क को प्रधान माना : प्रो झा
कार्यक्रम के आठवें सत्र में वक्ता प्रो. रामनाथ झा ने भारतीय और पश्चिमी ज्ञान परंपराओं के मूल अंतर को रेखांकित करते हुए कहा कि भारत में ज्ञान की परंपरा अनुभव आधारित रही है, जबकि पश्चिमी दर्शन मुख्यतः तार्किक विश्लेषण पर केंद्रित रहा है। ऋषि और ऋषिका शब्द ही इस बात के प्रमाण हैं कि भारतीय ज्ञान कल्पना नहीं, प्रत्यक्ष अनुभव से विकसित हुआ। उन्होंने बताया कि आधुनिक विज्ञान जिसे सोलहवीं शताब्दी में गैलिलियो से आरंभ मानता है, उससे पहले यूरोप में ज्ञान की स्थिति सीमित थी, जबकि भारत में चेतना, पदार्थ और प्रकृति पर गहन विमर्श पहले से मौजूद था।
उन्होंने भारतीय दर्शन में स्थूल से सूक्ष्म की यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि पदार्थ, परमाणु और अंततः चेतना तक पहुँचने की अवधारणा आज के क्वांटम फिजिक्स से भी जुड़ती है। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि वर्नर हाइजेनबर्ग 1939 में रवीन्द्रनाथ टैगोर से भारतीय दर्शन को समझने भारत आए थे।
प्रो. झा ने यह भी कहा कि एर्विन श्रोडिंगर उपनिषदों से प्रभावित थे और उनकी चर्चित पुस्तक व्हाट इज लाइफ में जीवन की वैज्ञानिक व्याख्या के साथ भारतीय दार्शनिक दृष्टि दिखाई देती है। उन्होंने जॉन ए. व्हीलर और नील्स बोर के उदाहरण देते हुए कहा कि चेतना को समझने में भारतीय ग्रंथों की भूमिका को पश्चिमी वैज्ञानिकों ने भी स्वीकार किया। स्त्री विमर्श पर बोलते हुए प्रो. झा ने कहा कि वैदिक परंपरा में स्त्री-पुरुष को पूरक माना गया है, न कि अधीन। उन्होंने बृहदारण्यक उपनिषद का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय दर्शन में स्त्री और पुरुष समान तत्त्व के दो रूप हैं।
इतिहास लेखन पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने शोधार्थियों से आग्रह किया कि 12वीं से 18वीं शताब्दी के फ़ारसी दस्तावेज़ों का अध्ययन किए बिना मध्यकालीन भारत को समझना अधूरा रहेगा। उन्होंने कहा कि तथ्यात्मक और मूल स्रोतों पर आधारित शोध ही वास्तविक ज्ञान निर्माण की दिशा खोल सकता है।
सत्र के अंत में प्रो झा ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक अकादमिक विमर्श में पुनः स्थापित करने के लिए गंभीर, निर्भीक और स्रोत-आधारित शोध की आवश्यकता है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के मकड़जाल में न फंसे: प्रो सिसोदिया
एमपीआईएसएसआर, उज्जैन के निदेशक प्रो यतीन्द सिंह सिसोदिया ने कहा कि राष्ट्रीय विकास हमारे अनुसंधान से संभव है या नहीं यह विचार आवश्यक है। अनुसंधान में ज्ञान और कौशल दोनों होना आवश्यक है। विश्व जितनी तेज गति से बदल रहा है उसे दृष्टि में रखकर अनुसंधान करें। अनुसंधान क्षेत्रीय आवश्यकताओ विविधताओं को ध्यान में रखकर होना चाहिए । हमारा अध्यवसायी होना आवश्यक है। हमें अनुसंधान के विषय के चयन में गंभीरता व प्रासंगिकता का ध्यान रखना होगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के मकड़जाल में फंसे बिना अनुसंधान हेतु शोध प्रस्ताव तैयार कर सके यह शिक्षण आवश्यक है।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई प्रो आशीष पाण्डेय ने कहा कि हमारा लक्ष्य ही यह होना चाहिए कि शोध का केन्द्र भारत हो। भारतीय शोध हम फोर सी के माध्यम से कर सकते हैं कॉमपरहेन्सन ‘ कॉनसेप्ट ‘ कंस्ट्रक्स ‘, केसेज। हमें हमारी भाषा में ही रिसर्च करना चाहिए
प्रो वी के मल्होत्रा ने कहा कि हम अर्जन से पहले फेंकना चाहते हैं। पॉलिसी मेकर को अधिक समय लेना चाहिए। प्रो जी एस मूर्ति मे भारतीय ज्ञान परंपरा में शोध के महत्व को रेखांकित किया। संस्थान के निदेशक मुकेश कुमार मिश्र ने आभार माना। उन्होंने कहा कि इस समागम में 25 राज्यों के प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।
राष्ट्रीय शोधार्थी समागम–2026 के अंतिम दिन आयोजित समापन सत्र में भारतीय ज्ञान परंपरा, शोध की गुणवत्ता और कार्यसंस्कृति जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर गंभीर विचार-विमर्श हुआ।
डॉ अल्पना त्रिवेदी ने स्वागत भाषण दिया।

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