सरकार की ताज़ा घोषणा के अनुसार, अगले छह महीनों में केंद्र सरकार बाज़ार से ₹8 लाख करोड़ का कर्ज़ उठाने जा रही है। यह आंकड़ा वित्तीय वर्ष 2025 के लिए निर्धारित कुल उधारी का लगभग 54% है। जहां एक ओर यह कदम सरकारी योजनाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को गति देने की मंशा को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर यह कई गंभीर सवाल भी खड़ा करता है।
कोरोना के बाद की आर्थिक बहाली, वैश्विक
मंदी की आशंकाएं, और चुनावी वर्ष की प्राथमिकताएं—इन सबका मिला-जुला असर अब देश की राजकोषीय नीतियों में दिखने लगा है। ₹8 लाख करोड़ की उधारी कोई मामूली राशि नहीं है। यह तय करता है कि आने वाले महीनों में सरकार को अपनी आय और व्यय के बीच की खाई को भरने के लिए कर्ज़ पर अधिक निर्भर रहना होगा। हालांकि वित्त मंत्रालय का कहना है कि वित्तीय घाटा यानी फिस्कल डेफिसिट घटकर 5.1% पर आ सकता है, लेकिन इसके पीछे की हकीकत को अनदेखा नहीं किया जा सकता।
भारतीय अर्थव्यवस्था में कर संग्रहण की सीमाएं, महंगाई की ऊँचाइयां, और तेल जैसी आवश्यक वस्तुओं पर वैश्विक दबाव पहले से ही मौजूद हैं। ऐसे में यदि सरकार इतनी बड़ी राशि उधार लेती है, तो ब्याज भुगतान का भार भी भविष्य की सरकारों और आम जनता पर पड़ेगा। साथ ही, बैंकिंग प्रणाली में नकदी की उपलब्धता और निजी क्षेत्र को मिलने वाले कर्ज पर भी असर पड़ सकता है।
फिर सवाल उठता है—क्या यह कदम आत्मनिर्भरता की दिशा में है, या आने वाले चुनावों से पहले लोक-लुभावन योजनाओं के लिए संसाधन जुटाने की एक कोशिश?
सरकार को यह संतुलन साधना होगा कि विकास कार्यों को गति देते हुए वह देश की दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता को भी बनाए रखे। वित्तीय अनुशासन और पारदर्शिता ऐसे समय में पहले से कहीं अधिक ज़रूरी हो गई है, जब देश के करोड़ों युवा भविष्य को लेकर सपने देख रहे हैं।
सरकार के कर्ज़ लेने का यह फैसला देश की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकता है—लेकिन इसकी सटीकता और विवेकपूर्ण क्रियान्वयन ही तय करेगा कि यह बोझ बनेगा या अवसर।

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