देश की शान मानी जाने वाली आईटी इंडस्ट्री के भीतर एक कड़वी सच्चाई धीरे-धीरे सामने आ रही है: आज इंफोसिस और टीसीएस जैसी बड़ी कंपनियों में नौकरी शुरू करने वाले फ्रेशर इंजीनियर की मासिक आय एक प्रशिक्षित प्लंबर या इलेक्ट्रिशियन से भी कम रह गई है। यह केवल तुलना नहीं है, यह भारत की आईटी सफलता गाथा के नींव पर गंभीर सवाल है। करीब 15 वर्षों से फ्रेशर इंजीनियर्स के लिए शुरुआती वेतन 3.5 लाख रुपये प्रति वर्ष के आसपास ही अटका हुआ है। इस बीच देश में महंगाई, रहने का खर्च, और तकनीकी प्रशिक्षण की लागत कई गुना बढ़ गई है। यानी आज का फ्रेशर 2010 के फ्रेशर की तुलना में कम क्रय शक्ति और अधिक अपेक्षाओं के बीच जी रहा है।
इधर, महानगरों में प्लंबर, बढ़ई या इलेक्ट्रीशियन आसानी से ₹35,000 से ₹50,000 मासिक कमा रहे हैं, वहीं देश के प्रतिष्ठित आईटी संस्थानों के फ्रेशर टैक्स कटौती के बाद ₹22,000 से ₹26,000 की सैलरी में जीवन चला रहे हैं। फर्क सिर्फ आय का नहीं है—सम्मान और करियर ग्रोथ की धारणा का भी है।
तकनीकी योग्यता, डेटा एनालिटिक्स, एआई और क्लाउड कंप्यूटिंग जैसी नई मांगों के बीच कंपनियां स्किल्स तो मांग रही हैं, पर वेतन में कोई फर्क नहीं कर रहीं। फ्रेशर इंजीनियर केवल सस्ते वर्कफोर्स की तरह उपयोग हो रहे हैं—कॉर्पोरेट मुनाफे के लिए एक स्थिर लागत पर मिलती प्रतिभा।
चिंता की बात यह भी है कि अब इन कंपनियों ने भर्ती में कटौती कर दी है। कई छात्र ऑफर लेटर मिलने के बाद महीनों तक ऑनबोर्ड नहीं हो पा रहे, जबकि उनसे निरंतर अपस्किलिंग की अपेक्षा की जाती है। यह न केवल आर्थिक असमानता बढ़ा रहा है, बल्कि भारत की डिजिटल इमेज को भी चुनौती दे रहा है।
अगर समय रहते संरचनात्मक सुधार नहीं हुए, तो यह दोहरी मार बनेगा—
1. प्रतिभा का पलायन स्टार्टअप्स, गिग इकॉनॉमी और विदेशों की ओर2. प्रतिष्ठित कंपनियों में करियर शुरू करने का आकर्षण धीरे-धीरे खत्म होना
भारत को अगर डिजिटल महाशक्ति बनना है, तो आईटी फ्रेशर्स को भी गरिमा और ग्रोथ दोनों देनी होगी। एक प्लंबर अगर 50 हज़ार मांग सकता है, तो एक इंजीनियर क्यों नहीं?
वास्तविक समाधान वेतन चर्चा को सतही तुलना से निकालकर नीति, प्रतिष्ठा और प्रतिभा-प्रेरणा के स्तर पर लाना होगा—तभी भारत की आईटी साख बनी रहेगी।
#इंजीनियर_सैलरी #मिस्त्री_कीमत #इंफोसिस #TCS #फ्रेशर्स_सैलरी #रोजगार_विवाद #आईटी_जॉब्स