भारतीय सेना के उपसेनाध्यक्ष (Deputy COAS) लेफ्टिनेंट जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने हालिया वक्तव्य में ऑपरेशन सिंदूर के अनुभवों को साझा करते हुए यह स्पष्ट किया है कि पाकिस्तान के साथ हालिया टकराव केवल एक पारंपरिक संघर्ष नहीं था, बल्कि यह भारत के समक्ष खड़े तीन स्तरीय खतरों – पाकिस्तान, चीन और सीमा पार आतंकवाद – की एक साझा चुनौती थी। उनका यह बयान केवल सैन्य रणनीति की बात नहीं करता, बल्कि एक बड़े कूटनीतिक और सामरिक सत्य को सामने लाता है: चीन और पाकिस्तान की गहरी साजिशें अब युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं रहीं, वे प्रयोगशालाओं में हथियारों के परीक्षण से लेकर हाइब्रिड वॉरफेयर तक विस्तृत हो चुकी हैं।
चीन द्वारा पाकिस्तान को “लाइव लैब” के रूप में इस्तेमाल करने का आरोप बेहद गंभीर है। इससे संकेत मिलता है कि बीजिंग न केवल पाकिस्तान को सामरिक रूप से समर्थन दे रहा है, बल्कि अपनी उन्नत तकनीकों और युद्ध सामग्री को रीयल-टाइम संघर्षों में परखने के लिए उसका प्रयोग भी कर रहा है। इस रणनीति के तहत भारत को सीधे या परोक्ष रूप से उन हथियार प्रणालियों और तकनीकों का सामना करना पड़ता है जो बाद में चीन द्वारा स्वयं भारत के विरुद्ध उपयोग की जा सकती हैं।
इस पूरे परिदृश्य में भारत को यह समझना होगा कि अब युद्ध की परिभाषा केवल सीमाओं पर टकराव तक सीमित नहीं रही। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना को जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ा, वे पारंपरिक युद्धों की तुलना में कहीं अधिक जटिल और बहुस्तरीय थीं। ड्रोन हमलों, सायबर घुसपैठ, इलेक्ट्रॉनिक जामिंग और रियल-टाइम खुफिया साझेदारी – ये सभी ऐसे कारक थे जिन्होंने इस ऑपरेशन को आधुनिक युग के युद्ध का एक प्रतिनिधि बना दिया।
लेफ्टिनेंट जनरल द्विवेदी ने यह भी रेखांकित किया कि भारतीय सेना को “एक सीमा, तीन दुश्मन” के सिद्धांत के अनुसार अपनी रणनीति और सैन्य तैयारी को दोबारा परिभाषित करने की आवश्यकता है। भारत की पारंपरिक युद्ध संरचना अब इस बहुस्तरीय खतरे के लिए अपर्याप्त साबित हो सकती है यदि उसमें तकनीकी लचीलापन, रैपिड रेस्पॉन्स स्ट्रक्चर और इंटर-डोमेन समन्वय नहीं जोड़ा गया।
यह भी एक महत्वपूर्ण संकेत है कि भारत को अब पाकिस्तान के साथ टकराव को केवल द्विपक्षीय नहीं, बल्कि त्रिपक्षीय और बहुस्तरीय खतरे के रूप में देखना चाहिए – जहाँ पाकिस्तान एक फ्रंटल एडवर्सरी है, लेकिन उसके पीछे चीन का छाया-युद्ध चल रहा है, और भीतर आतंकवाद का जाल पनप रहा है।
इसलिए यह समय है कि भारत न केवल अपनी सीमाओं को सैन्य दृष्टि से सशक्त बनाए, बल्कि डिप्लोमैटिक, साइबर और सूचना युद्ध के मोर्चों पर भी तैयार रहे। साथ ही, हथियारों के स्वदेशीकरण, तकनीकी उन्नयन और थियेटर कमांड स्ट्रक्चर को तीव्र गति से लागू करना अब केवल रणनीतिक विकल्प नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की अनिवार्यता बन गया है।
भारतीय सेना का यह साहसिक दृष्टिकोण केवल युद्ध जीतने का नहीं, बल्कि युद्ध के मायनों को नए सिरे से गढ़ने का प्रतीक है – एक ऐसा दृष्टिकोण जो भारत को भविष्य की किसी भी त्रिस्तरीय चुनौती से निपटने के लिए सक्षम बनाएगा।
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