भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में गिना जा रहा है। 2024-25 के लिए IMF ने भारत की विकास दर 7% बताई है और अगले साल भी 6.5% के आसपास रहने का अनुमान है। शेयर बाजार रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं, स्टार्टअप्स की संख्या बढ़ रही है, और डिजिटल इकोनॉमी गाँव-गाँव तक पहुँचने लगी है। लेकिन इस चमक के नीचे एक गहरी असमानता की दरार छिपी हुई है, जो देश के सामाजिक ताने-बाने को धीरे-धीरे कमजोर कर रही है।

अर्थव्यवस्था में असमानता: एक गहरी खाई

ऑक्सफैम इंडिया की रिपोर्ट बताती है कि भारत के सबसे अमीर 1% लोगों के पास देश की 40% से अधिक संपत्ति है, जबकि निचली 50% आबादी के पास मात्र 3% संपत्ति है। यह असमानता केवल संपत्ति तक सीमित नहीं है। PLFS 2024 के अनुसार, शहरी युवाओं में बेरोजगारी दर 17.2% है, जो राष्ट्रीय औसत 7.4% से कहीं अधिक है। ग्रामीण मजदूरों की मजदूरी 2017 के स्तर से भी नीचे चली गई है। कृषि क्षेत्र, जिसमें 45% आबादी कार्यरत है, आज भी GDP में केवल 15% योगदान दे रहा है।

विनिर्माण और सेवा क्षेत्र: समानता की ओर से दूर

विनिर्माण क्षेत्र, जिसे रोजगार सृजन का इंजन माना जाता है, तीन दशकों से GDP में 16-17% हिस्सेदारी पर स्थिर है। सेवा क्षेत्र ने तेज़ी से विस्तार किया है, लेकिन इसका लाभ शहरी, अंग्रेजीभाषी, तकनीकी रूप से कुशल वर्ग तक सीमित रहा है। नतीजा यह है कि एक ओर भारत डिजिटल भुगतान, अंतरिक्ष अन्वेषण और हरित ऊर्जा में वैश्विक भूमिका निभा रहा है, वहीं दूसरी ओर देश का एक बड़ा हिस्सा शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण जैसी बुनियादी ज़रूरतों के लिए जूझ रहा है।

सरकारी योजनाओं की असफलता: सतही राहत

सरकार की योजनाएँ—जैसे जन धन योजना, आयुष्मान भारत, उज्ज्वला योजना, PM किसान—ने गरीब तबके को कुछ राहत दी है। लेकिन यह राहत सतही है और स्थायी आर्थिक सशक्तिकरण नहीं बन पाई है। उदाहरण के लिए, प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बने लाखों घरों में से कई में बुनियादी सुविधाओं की कमी है, जिससे वे अनुपयोगी साबित हो रहे हैं। इसी तरह, POSHAN अभियान के बावजूद कुपोषण और एनीमिया के आँकड़े बेहद चिंताजनक हैं—36% बच्चे आज भी कुपोषित हैं और 57% महिलाएँ एनीमिया से पीड़ित हैं।

कर संरचना और बढ़ती असमानता

कर संरचना भी असमानता को बढ़ा रही है। प्रत्यक्ष करों में सुधार के बावजूद अप्रत्यक्ष करों (जैसे GST) का बोझ गरीब और निम्न मध्यम वर्ग पर अधिक है। 2024 में GST संग्रह ने भले ही रिकॉर्ड बनाया हो, लेकिन इसका प्रभाव उपभोक्ता महँगाई में भी साफ दिखता है। इसी बीच, अरबपतियों की संपत्ति में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है।

समावेशी और टिकाऊ विकास के लिए कदम

इस आर्थिक विकास को टिकाऊ और समावेशी बनाने के लिए सरकार को शिक्षा और स्वास्थ्य पर GDP का कम से कम 6% और 3% क्रमशः खर्च करना होगा। स्किल डेवलपमेंट कार्यक्रमों को गाँव और छोटे शहरों तक वास्तविक पहुँच दिलानी होगी, और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा का मजबूत तंत्र बनाना होगा।

भारत का सपना: 2047 तक एक विकसित राष्ट्र

भारत 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनने का सपना देख रहा है। लेकिन यदि आर्थिक विकास की गति के साथ सामाजिक न्याय और समान अवसर सुनिश्चित नहीं किए गए, तो यह सपना कुछ चुनिंदा वर्गों तक सीमित रह जाएगा। सच्चा विकास वही है जो हर गाँव, हर गली और हर नागरिक के जीवन में सार्थक बदलाव लाए।

निष्कर्ष

भारत की आर्थिक वृद्धि की यह चमक, अगर सही दिशा में न चलाई जाए, तो समाज में असमानता की खाई और गहरी हो सकती है। सरकार को यह समझना होगा कि केवल जीडीपी की वृद्धि से ही समाज का वास्तविक विकास नहीं होगा। सामाजिक न्याय और समावेशी विकास के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। केवल तभी हम एक सशक्त और समृद्ध राष्ट्र की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं, जहां हर नागरिक को समान अवसर मिले और हर क्षेत्र का विकास हो।

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