सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल :  चीन के बढ़ते परमाणु जखीरे को लेकर वैश्विक रणनीतिक संतुलन पर नई बहस छिड़ गई है। हालिया रक्षा आकलनों के अनुसार, China ने अपने न्यूक्लियर वारहेड्स और मिसाइल क्षमताओं में तेज़ी से विस्तार किया है, जिससे United States में चिंता बढ़ी है। वॉशिंगटन के रणनीतिक समुदाय का मानना है कि बीजिंग पारंपरिक “न्यूनतम प्रतिरोध” नीति से आगे बढ़कर अधिक विश्वसनीय और विविधीकृत परमाणु क्षमता की ओर कदम बढ़ा रहा है।

रिपोर्ट्स में नए मिसाइल साइलो, लंबी दूरी की अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM), पनडुब्बी-आधारित प्रणालियों और हाइपरसोनिक तकनीक के विकास का उल्लेख है। विशेषज्ञों का कहना है कि परमाणु त्रयी—भूमि, समुद्र और वायु—के संतुलित सुदृढ़ीकरण से चीन की प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है। यह विस्तार इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षा समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।

अमेरिका की ओर से भी रक्षा आधुनिकीकरण और सहयोगी देशों के साथ समन्वय पर जोर बढ़ा है। पेंटागन रणनीतिक स्थिरता बनाए रखने के लिए निरोधक क्षमता, मिसाइल डिफेंस और हथियार नियंत्रण संवाद की संभावनाओं पर विचार कर रहा है। कुछ विश्लेषक मानते हैं कि पारदर्शिता और संवाद की कमी से गलतफहमी का जोखिम बढ़ सकता है, इसलिए सैन्य-से-सैन्य संपर्क और विश्वास-निर्माण उपाय महत्वपूर्ण हैं।

वैश्विक स्तर पर परमाणु हथियारों की होड़ को लेकर चिंता स्वाभाविक है। हालांकि कई विशेषज्ञ यह भी रेखांकित करते हैं कि प्रतिरोध का सिद्धांत अभी भी बड़े पैमाने के संघर्ष को रोकने में भूमिका निभाता है। आने वाले समय में कूटनीतिक पहल, क्षेत्रीय साझेदारियां और हथियार नियंत्रण वार्ताएं इस बढ़ती प्रतिस्पर्धा के संतुलन को तय करेंगी।

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