सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, भोपाल परिसर में षाण्मासिक प्राक् शोध पाठ्यक्रम के समापन के अवसर पर भारतीय विद्याओं में अनुसंधान की परंपराएं विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य आयोजन किया गया। संगोष्ठी का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा में अनुसंधान की अवधारणा, पद्धति एवं समकालीन प्रासंगिकता पर विद्वानों एवं शोधार्थियों के बीच विमर्श स्थापित करना था।
उद्घाटन सत्र का शुभारंभ माँ शारदे के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ किया गया। अतिथि देवो भव की भारतीय परंपरा का निर्वहन करते हुए कार्यक्रम में पधारे विशिष्ट अतिथियों का शॉल, श्रीफल एवं पुष्पमाला भेंट कर सम्मान किया गया।
मुख्य सारस्वत वक्ता एवं शोध-अधिष्ठाता आचार्य श्रीधर मिश्र ने अपने संबोधन में कहा कि शोध केवल तथ्यों का संकलन नहीं, बल्कि सत्य की खोज की एक साधना है। उन्होंने शोध की प्रक्रिया को गीता के कर्मयोग से जोड़ते हुए निष्काम भाव से ज्ञान-साधना पर बल दिया तथा कहा कि भारतीय अनुसंधान का उद्देश्य ‘स्व’ से ‘सर्व’ की ओर बढ़ते हुए लोक-कल्याण करना है।
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि आचार्य सोहनलाल पाण्डेय ने शोध शीर्षक के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि शोध का शीर्षक पुस्तक के शीर्षक से भिन्न होता है और सही शीर्षक चयन ही शोध की दिशा निर्धारित करता है।
मुख्य अतिथि आचार्य पण्डा ने कहा कि प्राचीन मेधा और आधुनिक मनीषा का समन्वित अनुसंधान ही मानवता के अभ्युदय का आधार है।
अध्यक्षीय उद्बोधन में परिसर निदेशक एवं कार्यक्रम अध्यक्ष प्रो. हंसधर झा ने कहा कि केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय का प्रमुख ध्येय प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा को समकालीन संदर्भों में जीवंत एवं प्रासंगिक बनाना है तथा शोधार्थी इस लक्ष्य की पूर्ति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
कार्यक्रम की प्रस्तावना षाण्मासिक प्राक् शोध पाठ्यक्रम समन्वयक गोविंद पाण्डेय ने प्रस्तुत की। अतिथि परिचय एवं प्रास्ताविक वक्तव्य शोध केन्द्र कृपाशंकर शर्मा ने दिया। कार्यक्रम का संचालन शोध छात्र पुष्कर तिवारी ने किया। षाण्मासिक पाठ्यक्रम की छह माह की गतिविधियों का विवरण शोध छात्र गजेंद्र पुरोहित ने पीपीटी के माध्यम से प्रस्तुत किया। धन्यवाद ज्ञापन शोध छात्र शक्ति शुक्ला ने किया।

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