सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सी.ए.जी.) श्री के. संजय मूर्ति ने आज भोपाल में डॉ. अरविंद पनगढ़िया की अध्यक्षता में सोलहवें वित्त आयोग के साथ बैठक की। यह उच्च स्तरीय परामर्श आयोग द्वारा केंद्र और राज्यों के वित्तीय परिदृश्य के मूल्यांकन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। विचार-विमर्श मुख्य रूप से तीन प्रमुख क्षेत्रों: संघ और राज्य वित्त, स्थानीय निकाय और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम (पी.एस.ई.) पर केंद्रित था। संघ, राज्य, स्थानीय निकाय और पी.एस.ई. सी.ए.जी. की लेखापरीक्षा के अधीन हैं। इसके अलावा, सी.ए.जी. राज्यों के लेखाओं का भी रखरखाव करता है।
सी.ए.जी. ने विभिन्न क्षेत्रों में संघ और राज्यों के लिए विभिन्न लेखापरीक्षा निष्कर्षों, राजकोषीय चुनौतियों और तनाव बिंदुओं को साझा किया, जिसमें केंद्र और राज्यों के लिए व्यय और गैर-ऋण प्राप्तियों के बीच का अंतर भी शामिल है। प्रमुख विचारणीय बिन्दुओं में राज्यों के स्वामित्व वाले कर राजस्व (एस.ओ.टी.आर.) में गिरावट और राज्यों के एस.ओ.टी.आर. और गैर-कर राजस्व के अलग-अलग स्तर शामिल हैं, जो अधिक मजबूत राजस्व संग्रह तंत्र की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं। सी.ए.जी. ने बजट से बाहर उधारी की नियमित रिपोर्टिंग, एफ.आर.बी.एम. लक्ष्यों को पूरा करने तथा सी.ए.जी. द्वारा अपनी रिपोर्टों में गणना की गई लेखापरीक्षा के बाद की देनदारियों को ध्यान में रखने की आवश्यकता की ओर ध्यान आकर्षित किया। यह संघ और राज्यों के लिए राजकोषीय समेकन की सीमा की जांच करते समय वित्त आयोग के लिए सूचना का एक महत्वपूर्ण स्रोत हो सकता है।
सी.ए.जी. की प्रस्तुति ने अप्रयुक्त राजस्व स्रोतों की ओर ध्यान आकर्षित किया। उल्लेखनीय रूप से, स्टाम्प ड्यूटी, पंजीकरण शुल्क और राज्य उत्पाद शुल्क संग्रह जैसे क्षेत्रों की पहचान ऐसे क्षेत्रों के रूप में की गई है जिनमें राजकोषीय प्रदर्शन को बढ़ाने की पर्याप्त संभावना है। इस संबंध में सिफारिशों में बाजार मूल्य दिशानिर्देशों के लिए नियमित अद्यतन, संपत्ति के प्रकारों का बेहतर वर्गीकरण, और राजस्व रिसाव को कम करने और आंकड़ों की सटीकता में सुधार करने के लिए आधुनिक तकनीक- जैसे सेंसर-आधारित सिस्टम और क्यूआर कोड को अपनाना शामिल हैं।
वस्तु एवं सेवा कर (जी.एस.टी.) प्रशासन के क्षेत्र में, सीएजी ने कर आधार को व्यापक करने और पारदर्शिता बढ़ाने के उद्देश्य से कई सुधारों का भी प्रस्ताव किया है। सुझाए गए उपायों में संशोधित करदाता सत्यापन प्रक्रियाओं के साथ-साथ स्वचालित आंकड़ों का संग्रह और वास्तविक समय की सूचना प्रणाली के माध्यम से जी.एस.टी. ढांचे में अपंजीकृत वस्तुओं और सेवा प्रदाताओं का एकीकरण शामिल है। इन पहलों से न केवल कर संग्रह प्रक्रिया सुव्यवस्थित होने की उम्मीद है, बल्कि अंतर-राज्य कर प्रवाह का अधिक सटीक विभाजन भी हो सकता है।
सी.ए.जी. ने तुलनीय राजकोषीय सूचना की पारदर्शी और तत्काल उपलब्धता के लिए सरकार के सभी स्तरों पर लेखांकन प्रथाओं को मानकीकृत करने की आवश्यकता पर जोर दिया। प्रस्तुति में व्यय के वस्तु शीर्षों के सामंजस्य और विचलन के बिना राज्य सरकारों द्वारा एक समान 6-स्तरीय वर्गीकरण प्रणाली को अपनाने का आह्वान किया गया। इस बात पर भी प्रकाश डाला गया कि तत्काल उपाय के रूप में शीर्ष 100 शहरों में केंद्र और राज्य खातों के साथ स्थानीय निकायों के खातों के सामंजस्य का प्रयास किया जा सकता है। इस तरह के कदम राजकोषीय आंकड़ों के निर्बाध समेकन की सुविधा प्रदान करेंगे और सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन में पारदर्शिता को मजबूत करेंगे, जिससे नीति निर्माताओ को राजस्व और व्यय दोनों में स्पष्ट जानकारी के साथ सशक्त बनाया जा सकेगा।
चर्चा का एक महत्वपूर्ण आकर्षण अच्छी प्रथाओं का समर्थन था, जैसे कि अधिशेष राजस्व वाले क्षेत्राधिकारों द्वारा बजट स्थिरीकरण कोष की स्थापना। यह निधि, खनिज संसाधनों जैसे विशिष्ट राजस्व स्रोतों से प्राप्त आय का उपयोग करके अप्रत्याशित बजटीय कमी या चक्रीय व्यवधानों से निपटने के लिए तैयार की गई है, तथा इसे समान राजकोषीय प्रोफाइल वाले अन्य क्षेत्रों के लिए एक अनुकरणीय मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस उपाय को अपनाने से वित्तीय लचीलेपन में वृद्धि और सभी क्षेत्राधिकारों में अधिक स्थिर राजकोषीय प्रबंधन में बढ़ोतरी हो सकती है।
बैठक का एक प्रमुख घटक स्थानीय निकायों के वित्तीय प्रबंधन पर केंद्रित है। सी.ए.जी. ने कई शहरी स्थानीय निकायों और पंचायती राज संस्थानों में निष्पादन लेखापरीक्षा के अंश साझा किए, जिसमें कार्यो के अधूरे हस्तांतरण, केंद्रीय और राज्य अनुदान पर भारी निर्भरता और स्वयं के राजस्व स्रोत के निम्न स्तर जैसे मुद्दों की ओर इशारा किया गया। इस संबंध में, सिफारिशों में राज्यों द्वारा यू.एल.बी. और आर.एल.बी. को किए गए भुगतान/निधि हस्तांतरण के लिए एकीकृत वित्तीय प्रबंधन प्रणाली (आई.एफ.एम.एस.) के स्थानीय निकाय उपयोग को एकीकृत करना और जमीनी स्तर पर सुसंगत और पारदर्शी वित्तीय रिपोर्टिंग सुनिश्चित करने के लिए लेखांकन प्रथाओं को सुव्यवस्थित करना शामिल है। यू.एल.बी./आर.एल.बी. के लेनदेन के प्रसंस्करण तथा उनके लेखाओं के लिए विशेष रूप से उपयुक्त प्रणाली के विकास की आवश्यकता का सुझाव दिया गया था, जिसे एफ.सी. द्वारा प्रोत्साहित किया जा सकता है।
इसके अतिरिक्त, प्रस्तुति ने राज्य के सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के वार्षिक खातों को प्रस्तुत करने में निगरानी की कमी को संबोधित किया, लगातार नुकसान और अक्षमताओं को दूर करने के लिए सुधारात्मक उपायों का आग्रह किया, और विनिवेश रणनीतियों की कड़ी निगरानी की सिफारिश की।
कुल मिलाकर, 16वें वित्त आयोग के साथ सीएजी की बातचीत ने राजकोषीय पारदर्शिता को मजबूत करने, राजस्व प्रदर्शन को बढ़ाने और सरकार के सभी स्तरों पर मजबूत वित्तीय प्रबंधन सुनिश्चित करने के लिए एक विस्तृत रोडमैप प्रदान किया। अनुशंसित उपायों की परिकल्पना जवाबदेही को बढ़ावा देने, कुशल संसाधन आवंटन के संचालन और संघ और राज्यों के दीर्घकालिक राजकोषीय समेकन का समर्थन करने के लिए की गई है।
एफ.सी. के अध्यक्ष डॉ. अरविंद पनगढ़िया ने अपने समापन भाषण में आयोग को ये जानकारी प्रदान करने में सी.ए.जी. द्वारा किए गए प्रयासों की सराहना की, जो उनकी सिफारिशें तैयार करते समय बहुत मूल्यवान होगा।
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