बांग्लादेश में परिधान उद्योग से जुड़े हिंदू श्रमिक दीपू चंद्र दास की भीड़ द्वारा हत्या, और उसके बाद शव के साथ की गई क्रूरता, किसी एक समुदाय या एक इलाके की घटना भर नहीं है। यह उस खतरनाक प्रवृत्ति का संकेत है जिसमें “आरोप” सत्यापन से पहले ही सजा बन जाता है, और भीड़ खुद को कानून, जांच और न्यायालय से ऊपर मानने लगती है। जब समाज में आस्था, पहचान और अफवाह का मिश्रण इतना विस्फोटक हो जाए कि किसी व्यक्ति की जान एक रात में “जन-निर्णय” के नाम पर मिटा दी जाए, तब असल प्रश्न केवल अपराध का नहीं रहता, बल्कि राज्य की क्षमता और समाज की नैतिकता दोनों की परीक्षा शुरू हो जाती है।
ऐसी घटनाओं में सबसे पहले जो चीज टूटती है, वह नागरिक का भरोसा होता है। सामान्य व्यक्ति यह सोचने लगता है कि अगर किसी पर आरोप लगते ही भीड़ फैसला सुनाने लगे, तो सुरक्षा की गारंटी आखिर किसके पास है। यह डर केवल अल्पसंख्यकों तक सीमित नहीं रहता। भीड़ की हिंसा का ढांचा एक बार स्थापित हो जाए, तो उसका अगला शिकार कोई भी हो सकता है, कोई मजदूर, कोई छात्र, कोई दुकानदार, कोई महिला, कोई प्रवासी। आज यदि “धार्मिक अपमान” या “भावनाएं आहत” होने का आरोप हथियार बन रहा है, तो कल यह हथियार व्यक्तिगत रंजिश, कार्यस्थल विवाद, या आर्थिक प्रतिस्पर्धा के लिए भी इस्तेमाल हो सकता है। धर्म, पहचान या नैतिकता की भाषा कई बार असल कारणों पर पर्दा डाल देती है, और भीड़ उसी पर्दे को सच मानकर खून तक पहुंच जाती है।
राज्य की भूमिका यहां निर्णायक है। किसी घटना की निंदा कर देना और कुछ गिरफ्तारियां कर लेना जरूरी है, पर पर्याप्त नहीं। असली कसौटी यह है कि जांच कितनी निष्पक्ष, तेज और पारदर्शी होती है, और क्या सजा सिर्फ प्रत्यक्ष हमलावरों तक सीमित रहती है या उन उकसाने वालों तक भी पहुंचती है जिन्होंने भीड़ को भड़काया, अफवाह फैलायी, या सोशल मीडिया और स्थानीय नेटवर्क के जरिए माहौल बनाया। यदि उकसावे का तंत्र सुरक्षित रह गया, तो हिंसा की पुनरावृत्ति केवल समय की बात होगी। कानून का डर तब पैदा होता है जब समाज को दिखे कि अपराध की कीमत चुकानी पड़ती है, और वह कीमत वास्तविक होती है, प्रतीकात्मक नहीं।
#भीड़कीअदालत #इंसानियत #दीपूचंद्रदास #सामाजिकसचेतना #न्यायऔरसुरक्षा #हिंसासमाज