अमेरिका द्वारा कुछ प्रमुख उत्पादों पर टैरिफ बढ़ाए जाने की घोषणा से वैश्विक व्यापार जगत में हलचल मच गई है, लेकिन भारत की कॉरपोरेट दुनिया इस फैसले को लेकर विशेष रूप से चिंतित नहीं दिख रही है। भारत की प्रमुख कंपनियों और व्यापार संगठनों का मानना है कि इस टैरिफ नीति का भारत की अर्थव्यवस्था पर सीमित प्रभाव पड़ेगा।

टैरिफ सूची में भारत की सीमित हिस्सेदारी

विशेषज्ञों के अनुसार, इस सीमित प्रभाव के पीछे दो मुख्य कारण हैं—

जिन उत्पादों पर अमेरिका ने टैरिफ बढ़ाया है, उनका भारत से निर्यात अपेक्षाकृत कम है।

भारत ने अपने निर्यात पोर्टफोलियो में विविधता लाने पर पिछले कुछ वर्षों में विशेष ध्यान दिया है।

भारत अब केवल एक या दो प्रमुख क्षेत्रों पर निर्भर न रहकर फार्मा, ऑटो कंपोनेंट्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और टेक्सटाइल जैसे विविध क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत कर चुका है।

चीन-प्लस वन रणनीति का लाभ भारत को

‘चीन-प्लस वन’ रणनीति के चलते अमेरिका और यूरोप जैसे बाजार भारत की ओर रुख कर रहे हैं। यह भारत के लिए एक बड़ा अवसर है कि वह वैश्विक आपूर्ति शृंखला में अपनी भूमिका को और मजबूत करे।

भारतीय कंपनियां अब केवल किसी एक देश या क्षेत्र पर निर्भर नहीं रहना चाहतीं। वे वैश्विक असंतुलनों को अवसर में बदलने की क्षमता रखती हैं।

सरकार की सक्रिय नीतियाँ बना रही रास्ता

भारत सरकार की ‘मेक इन इंडिया’, ‘पीएलआई योजना’, और मुक्त व्यापार समझौते (FTA) जैसी नीतियाँ भारत को वैश्विक व्यापार के पुनर्संतुलन में एक स्थायी और विश्वसनीय साझेदार बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

नीतिगत सुधारों की अहम भूमिका

भारत को अब केवल निर्यात में बढ़ोतरी पर ही नहीं, बल्कि तकनीकी दक्षता, श्रम सुधार, लॉजिस्टिक्स और इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा। इन्हीं सुधारों के माध्यम से भारत अंतरराष्ट्रीय उत्पादन हब बनने की दौड़ में निर्णायक रूप से आगे बढ़ सकता है।

निष्कर्ष: टैरिफ संकट में छिपा अवसर

अमेरिकी टैरिफ नीति भारत के लिए एक चुनौती से अधिक अवसर का रूप ले सकती है—यदि नीति और निष्पादन में संतुलन बना रहे। भारत आने वाले समय में वैश्विक व्यापार में एक स्थायी और रणनीतिक भूमिका निभाने की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ रहा है।

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