ईरान पर अमेरिकी बमबारी ने एक बार फिर वैश्विक राजनीति को अस्थिरता के दायरे में ला खड़ा किया है। इज़राइल–ईरान टकराव की पृष्ठभूमि में अमेरिका द्वारा उठाया गया यह कदम केवल एक सामरिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक पुरानी आदत की पुनरावृत्ति है — अमेरिका का किसी दूर देश में युद्ध में कूद जाना।
यह पहला अवसर नहीं है जब अमेरिका ने ‘सुरक्षा’ या ‘स्थिरता’ के नाम पर किसी और की धरती को रणभूमि बना डाला हो। अफगानिस्तान, इराक, लीबिया और सीरिया जैसे उदाहरण पहले से ही इस नीति के खतरनाक नतीजे दिखा चुके हैं — लंबे युद्ध, अस्थायी समाधान और लाखों निर्दोष नागरिकों की पीड़ा।
ईरान पर सीधा हमला केवल एक सैन्य निर्णय नहीं, बल्कि एक व्यापक क्षेत्रीय संकट को हवा देने वाला कदम बन सकता है। इस समय जब पूरा पश्चिम एशिया ग़ाज़ा, यमन, हिज़्बुल्ला और अनेक अस्थिरताओं से घिरा है, ऐसे में अमेरिका का यह हस्तक्षेप एक नये युद्ध क्षेत्र के द्वार खोल सकता है।
अमेरिका इसे ‘डिटरेंस’ यानी निवारक कार्रवाई कह रहा है, परंतु इससे ईरान में कठोरपंथियों को नया अवसर मिलेगा और कूटनीति की संभावनाएं और भी क्षीण हो जाएंगी। इस कदम ने ना केवल ईरान, बल्कि पूरी दुनिया में अमेरिकी विश्वसनीयता और दीर्घकालिक सोच पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
भारत के लिए यह घटनाक्रम कई स्तरों पर चुनौतीपूर्ण है। कच्चे तेल के दामों में संभावित उछाल, खाड़ी देशों में रह रहे करोड़ों भारतीयों की सुरक्षा, और भारत की संतुलित विदेश नीति — सब कुछ इस निर्णय से प्रभावित हो सकता है। विशेष रूप से, जब भारत ने वाशिंगटन और तेहरान दोनों के साथ सधे हुए रिश्ते बनाए रखने की कोशिश की है।
आज की दुनिया युद्ध नहीं, शांति की मांग कर रही है। ऐसे समय में अमेरिका का यह कदम न केवल खतरनाक है, बल्कि वैश्विक समुदाय के उन प्रयासों के भी विपरीत है, जो संवाद, संयम और सहयोग पर आधारित हैं। यह युद्ध शुरू करना आसान है, पर उससे सम्मानजनक रूप से बाहर निकलना हमेशा कठिन रहा है — और यह अमेरिका भलीभांति जानता है।
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